1. पाठ्यक्रम मानचित्रण (Syllabus Mapping - UPSC)
सामान्य अध्ययन (GS) पेपर III (पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी): जैव विविधता संरक्षण, आवासों का विखंडन (Habitat Fragmentation), और संरक्षित क्षेत्र प्रबंधन (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972)।
सामान्य अध्ययन (GS) पेपर III (आपदा प्रबंधन): मानव-पशु संघर्ष एक बढ़ते पारिस्थितिक और कृषि संकट के रूप में; स्थानीय आपदा शमन (Mitigation) मॉडल।
सामान्य अध्ययन (GS) पेपर II (शासन व्यवस्था): केंद्र-राज्य कल्याणकारी नीतियां, संस्थागत जवाबदेही, और स्थानीय निकायों के लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं (SOPs)।
2. संकट के वैश्विक कारण और अखिल भारतीय परिदृश्य
भारत के पर्यावरण मंत्रालय (MoEFCC) और संसदीय स्थायी समितियों के आँकड़ों से स्पष्ट है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष अब केवल वनों की सीमाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक गंभीर राष्ट्रीय संकट बन चुका है।
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│ भारत में मानव-वन्यजीव संघर्ष के प्रमुख क्षेत्र │
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【तराई आर्क लैंडस्केप】 【मध्य भारत का बाघ ग्रिड】 【पश्चिमी घाट का हाथी गलियारा】
• उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सीमा। • मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़। • कर्नाटक, केरल और तमिलनाडु।
• गन्ने के खेतों को अपना नया घर बना • बाघों की बढ़ती आबादी के कारण युवा • हाथियों के पारंपरिक मार्गों (Pathways)
चुके तेंदुए और बाघ, जो कृषि श्रमिकों बाघों का जंगलों से बाहर आना और में रैखिक बुनियादी ढांचे (Linear
के सीधे संपर्क में आ रहे हैं। मानव बस्तियों में प्रवेश करना। Infrastructure) का भारी विस्तार।
A. संघर्ष बढ़ने के मुख्य संरचनात्मक कारण
संरक्षित क्षेत्रों की संतृप्ति (Reserve Saturation): भारत के सफल संरक्षण प्रयासों (जैसे प्रोजेक्ट टाइगर) के कारण बाघों और तेंदुओं की आबादी कई कोर क्षेत्रों में अपनी वहन क्षमता (Carrying Capacity) को पार कर चुकी है। इसके परिणामस्वरूप, युवा और कमजोर जानवर भोजन की तलाश में जंगलों से बाहर राजस्व भूमि (Revenue Land) की ओर विस्थापित हो रहे हैं।
आक्रामक प्रजातियों का प्रसार (Invasive Weeds): भारत के राष्ट्रीय उद्यानों में लैंटाना कैमारा (Lantana camara) जैसी विदेशी खरपतवारों के अत्यधिक प्रसार के कारण शाकाहारी पशुओं के लिए घास के मैदान समाप्त हो गए हैं। वन्य शाकाहारी पशुओं की कमी के कारण शिकारी जानवरों (Carnivores) को मजबूरन पालतू मवेशियों और इंसानों पर हमला करना पड़ रहा है।
व्यवहार में बदलाव (Loss of Fear): मानव बस्तियों के निकट रहने वाले हिंसक जानवर अब इंसानों की उपस्थिति के आदी हो चुके हैं। वे भोजन की तलाश में दिन-रात खेतों और गांवों में खुलेआम घूमते हैं, जिससे आमने-सामने के हिंसक टकराव की संभावना बढ़ गई है।
3. अखिल भारतीय मैक्रो-सांख्यिकी (Macro-Statistics)
मानवीय क्षति: भारत में हर साल हाथियों के साथ हुए टकराव में लगभग 500 लोगों की मौत होती है, जिसमें ओडिशा, पश्चिम बंगाल, असम और झारखंड में सबसे अधिक हताहत होते हैं। वहीं, बाघों और तेंदुओं के हमलों में हर साल सैकड़ों ग्रामीण और कृषि श्रमिक अपनी जान गंवाते हैं।
वन्यजीवों की मृत्यु दर: हालिया वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार, भारत में हर साल औसतन 150 से अधिक बाघों की मौत दर्ज की जा रही है, जिसका मुख्य कारण आपसी क्षेत्रीय लड़ाई (Territorial Infighting), ग्रामीणों द्वारा फसलों की सुरक्षा के लिए लगाए गए अवैध बिजली के तार (Live-wire fencing) और प्रतिशोधात्मक शिकार (Poisoning) हैं।
कृषि अर्थव्यवस्था पर आघात: गोखले राजनीति और अर्थशास्त्र संस्थान के एक अध्ययन के अनुसार, फसलों पर नीलगाय, जंगली सूअरों और हाथियों के हमलों के कारण अकेले महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों को सालाना ₹10,000 करोड़ से ₹40,000 करोड़ का नुकसान होता है। इसके चलते लगभग 62% सीमांत किसानों ने जंगलों से सटे अपने खेतों में खेती करना कम या बंद कर दिया है।
4. पिछले 12 महीनों में देश की प्रमुख घटनाएँ (क्रोनोलॉजिकल टाइमलाइन)
निम्नलिखित टाइमलाइन यह दर्शाती है कि कैसे पूरे भारत में मानव बस्तियाँ और वन्यजीवों का प्राकृतिक व्यवहार आपस में टकरा रहे हैं:
5. प्रशासनिक और नीतिगत समाधान (Administrative & Policy Way Forward)
एक सिविल सेवक के रूप में, मुख्य परीक्षा के उत्तर में आपको केवल समस्याओं को नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और व्यावहारिक समाधानों को प्रस्तुत करना चाहिए:
मुआवजा प्रक्रिया का सरलीकरण और वित्तीय वृद्धि: केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने वन्यजीव हमले में मृत्यु होने पर अनुग्रह राशि (Ex-gratia) को ₹5 लाख से बढ़ाकर ₹10 लाख कर दिया है। जिला प्रशासन को इस प्रक्रिया को पूरी तरह डिजिटल और भ्रष्टाचार-मुक्त बनाना चाहिए, ताकि पीड़ित परिवार को घटना के 7 दिनों के भीतर सीधे बैंक खाते (DBT) में सहायता राशि मिल सके, जिससे प्रतिशोधात्मक हिंसा को रोका जा सके।
एआई-संचालित प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियाँ (AI Early Warning Systems): कोयंबटूर और असम के वन प्रभागों की तर्ज पर संवेदनशील क्षेत्रों में एआई-कैमरा और इन्फ्रारेड सेंसर नेटवर्क स्थापित किए जाने चाहिए। जैसे ही कोई हाथी या बाघ जंगल की सीमा पार कर गांव की तरफ बढ़े, यह सिस्टम स्वतः ही स्थानीय ग्रामीणों और वन रक्षकों को मोबाइल पर एसएमएस (SMS) के जरिए अलर्ट भेज दे।
कम्पा (CAMPA) फंड के जरिए आवासों का जीर्णोद्धार: पर्यावरण क्षरण कोष (CAMPA) का उपयोग जंगलों के भीतर से लैंटाना जैसी आक्रामक घास को हटाने के लिए किया जाना चाहिए। जंगलों के भीतर स्थानीय घासों को दोबारा उगाने से जंगली शाकाहारी जीवों की संख्या बढ़ेगी, जिससे हिंसक जानवर भोजन के लिए गांवों का रुख नहीं करेंगे।
पीएम-कुसुम के तहत दिन में बिजली आपूर्ति: वनों से सटे संवेदनशील गांवों के किसानों को पीएम-कुसुम (PM-KUSUM) योजना के तहत अनिवार्य रूप से सोलर पंप दिए जाने चाहिए। खेतों में दिन के समय बिजली की निर्बाध आपूर्ति होने से किसान शाम या रात के अंधेरे (जो हिंसक पशुओं के शिकार का समय है) में खेतों में जाने से बच सकेंगे।
निष्कर्ष (Mains Concluding Thought): मानव-वन्यजीव संघर्ष एक विकासशील अर्थव्यवस्था की भूमि संबंधी आवश्यकताओं और देश की समृद्ध जैव विविधता के बीच बढ़ते असंतुलन का परिणाम है। वन्यजीव संरक्षण की सफलता तब तक अधूरी है जब तक कि स्थानीय समुदायों को सुरक्षा और आर्थिक लाभ नहीं मिलता। भारत की प्राकृतिक विरासत की रक्षा के लिए हमें अग्रिम पंक्ति के वन रक्षकों को आधुनिक तकनीकों से लैस करना होगा, वन्यजीव गलियारों को कानूनी संरक्षण देना होगा और स्थानीय युवाओं को 'इको-टूरिज्म' से जोड़कर इस संकट को "सह-अस्तित्व" (Co-existence) के मॉडल में बदलना होगा।
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