भारत का नारियल क्षेत्र
1. विषय का परिचय एवं सामाजिक-आर्थिक महत्व (GS Paper-3)
नारियल को भारतीय परंपरा में "कल्पवृक्ष" (जीवन की समस्त आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाला वृक्ष) माना जाता है। यह भारत की कृषि अर्थव्यवस्था, ग्रामीण आजीविका और सांस्कृतिक विरासत का अभिन्न अंग है।
आजीविका सुरक्षा: लगभग 10 मिलियन किसानों सहित करीब 30 मिलियन लोग प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से इस क्षेत्र पर निर्भर हैं।
समावेशी ग्रामीण विकास: नारियल की अधिकांश खेती छोटे और सीमांत किसानों द्वारा की जाती है, जिससे यह ग्रामीण अर्थव्यवस्था और रोजगार सृजन का मुख्य आधार बनता है।
बहुउपयोगिता: यह भोजन, पेय, औषधि, रेशा (Coir), इमारती लकड़ी, ईंधन और औद्योगिक कच्चा माल उपलब्ध कराता है।
2. महत्वपूर्ण तथ्य एवं आंकड़े (Prelims & Mains Data Bank)
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| प्रमुख सांख्यिकीय अवलोकन |
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| वैश्विक स्थान | • उत्पादन: प्रथम स्थान (वैश्विक कुल का 31.24%) |
| | • कृषि क्षेत्रफल: तृतीय स्थान (वैश्विक कुल का 17.90%) |
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| राष्ट्रीय उत्पादन (2024-25) | • कुल क्षेत्र: 2.19 मिलियन हेक्टेयर |
| | • कुल उत्पादन: 20,301.22 मिलियन नारियल |
| | • औसत राष्ट्रीय उत्पादकता: 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर |
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| राज्यवार अग्रणी स्थिति | • क्षेत्रफल: केरलम (लगभग 7.54 लाख हेक्टेयर) |
| | • कुल उत्पादन: तमिलनाडु |
| | • उत्पादकता: आंध्र प्रदेश (इसके बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु)|
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| निर्यात प्रदर्शन | • 2025-26 निर्यात मूल्य: ₹7,038.35 करोड़ (794.70 मिलियन USD) |
| | • वार्षिक वृद्धि: 62% (2024-25 के ₹4,349.03 करोड़ से) |
| | • शीर्ष निर्यात वस्तु: सक्रिय कार्बन (Activated Carbon) |
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3. मूल्य संवर्धन, निर्यात और बाजार विविधीकरण
भारत का नारियल क्षेत्र पारंपरिक जिंसों (कच्चा/सूखा नारियल) से आगे बढ़कर उच्च मूल्य-वर्धित उत्पादों (High Value-Added Products) के निर्यात की ओर अग्रसर हुआ है:
प्रमुख मूल्य-वर्धित उत्पाद:
सक्रिय कार्बन (Activated Carbon - मात्रा में शीर्ष निर्यात)
वर्जिन कोकोनट ऑयल (VCO)
नारियल का दूध एवं नारियल पानी
कद्दूकस किया हुआ सूखा नारियल (Desiccated Coconut)
बाजार का विस्तार: मध्य पूर्व के पारंपरिक बाजारों से आगे बढ़कर अब अमेरिका, यूएई, जर्मनी, रूस, तुर्किये, बेल्जियम, यूके, नीदरलैंड और ऑस्ट्रेलिया तक पहुंच।
राष्ट्रीय निर्यात लक्ष्यों में योगदान: यह भारत के कृषि निर्यात को 2030 तक $2 ट्रिलियन और 2047 तक $21 ट्रिलियन तक ले जाने के व्यापक राष्ट्रीय विजन के अनुकूल है।
4. नवाचार केस स्टडी: बहुस्तरीय कृषि मॉडल (Multi-Tier Cropping System)
केस स्टडी (छत्तीसगढ़ - बस्तर का पठार):
संदर्भ: गैर-पारंपरिक क्षेत्र में नारियल आधारित विविधीकरण (बकावंड ब्लॉक के किसान श्री ईशांश सिंह राठौर का मॉडल)।
पद्धति: 2,500 नारियल के पेड़ों (मुख्यतः ड्वार्फ किस्में) के साथ बहुस्तरीय फसल चक्र:
अधो-फसलें (Understory crops): 4,000 अनानास, 800 ड्रैगन फ्रूट, मौसमी सब्जियां, स्ट्रॉबेरी।
अन्य बागवानी प्रजातियां: आम (1,000 पेड़), सिट्रस (600 पेड़), केला, पपीता, लीची, कॉफी।
परिणाम: नारियल से वार्षिक ₹5-6 लाख और अंतर-फसलों से ₹10 लाख की अतिरिक्त आय। यह मॉडल गैर-पारंपरिक क्षेत्रों में जलवायु अनुकूलन और भूमि उपयोग दक्षता (Land-use Efficiency) का उत्कृष्ट उदाहरण है।
5. संस्थागत तंत्र: नारियल विकास बोर्ड (CDB)
स्थापना: 12 जनवरी 1981 (नारियल विकास बोर्ड अधिनियम, 1979 के तहत संविधिक निकाय)।
मुख्यालय: कोच्चि (केरलम)।
प्रशासनिक नियंत्रण: कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय।
प्रमुख कार्य एवं दायित्व:
गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का उत्पादन और नर्सरी प्रमाणन/मान्यता।
नए क्षेत्रों में रकबा विस्तार और पुराने बागानों का कायाकल्प।
भूसी (हस्क) और रेशे (फाइबर) को छोड़कर अन्य सभी नारियल उत्पादों के लिए निर्यात संवर्धन परिषद (EPC) के रूप में कार्य करना।
वैश्विक गुणवत्ता मानकों के लिए CDB को 'इंटीग्रेटेड रेगुलेटरी असेसमेंट फ्रेमवर्क' में शामिल किया गया है।
6. प्रमुख सरकारी नीतियां एवं विकासात्मक योजनाएं
A. न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) ढांचा (2026 सीजन)
कोपरा उन 22 अधिदिष्ट (Mandated) फसलों में शामिल है जिनके लिए सरकार MSP घोषित करती है। केंद्रीय नोडल खरीद एजेंसियां NAFED और NCCF हैं।
| कोपरा का प्रकार | प्राथमिक उपयोग | MSP 2026 (प्रति क्विंटल) | 2025 की तुलना में वृद्धि |
| मिलिंग कोपरा | तेल निष्कर्षण हेतु (गिरी सुखाकर) | ₹12,027 | ₹445 प्रति क्विंटल |
| बॉल (खाने योग्य) कोपरा | मेवे और धार्मिक उपयोग (पूरा नारियल सुखाकर) | ₹12,500 | ₹400 प्रति क्विंटल |
B. नारियल संवर्धन योजना (केंद्रीय बजट 2026-27)
उद्देश्य: कीट प्रकोप, रूट विल्ट रोग (Root Wilt Disease) और पुराने अनुत्पादक पेड़ों की समस्याओं का समाधान।
वित्तीय प्रावधान: काजू और कोको सहित उच्च मूल्य कृषि के लिए घोषित ₹350 करोड़ के पैकेज का हिस्सा।
मुख्य घटक: रोगग्रस्त बागानों का चरणबद्ध पुनर्रोपण, एकीकृत फसल स्वास्थ्य प्रबंधन, तथा मूल्य संवर्धन हेतु एकीकृत प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना।
C. CDB के प्रमुख कार्यक्रम
DSP फार्म (प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन फार्म): नए फार्मों की स्थापना हेतु पहले 2 वर्षों में ₹30 लाख; तीसरे वर्ष से रखरखाव हेतु ₹1.00 लाख/हेक्टेयर (15-20 वर्षों तक)।
क्षेत्र विस्तार योजना: नए क्षेत्रों में वैज्ञानिक रोपण हेतु ₹56,000 प्रति हेक्टेयर की सहायता (2 समान किस्तों में; 0.08 से 2 हेक्टेयर तक)।
PICCS (फसल प्रणाली आधारित उत्पादकता सुधार): क्लस्टर आधारित 100% लागत सब्सिडी (₹42,000/हेक्टेयर, 2 किस्तों में)।
पुनर्रोपण एवं जीर्णोद्धार (Replanting & Rejuvenation): पुराने व रोगग्रस्त पेड़ों को बदलने हेतु ₹54,000 प्रति हेक्टेयर तक की सहायता।
प्रौद्योगिकी मिशन (TMOC): कीट/रोग प्रबंधन, प्रसंस्करण और उत्पाद विविधीकरण का तकनीकी समर्थन।
केरा सुरक्षा बीमा योजना: ताड़ी/नीरा निकालने वाले तकनीशियनों, संकरण श्रमिकों व पेड़ पर चढ़ने वाले मजदूरों हेतु दुर्घटना बीमा।
7. कौशल विकास और उद्यम निर्माण पहल
फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री (FoCT): युवाओं को आधुनिक सुरक्षा उपकरणों के साथ पेड़ पर चढ़ने, पौध संरक्षण और प्राथमिक उपचार का व्यावहारिक प्रशिक्षण।
कोकोमित्र (कार्य बल इकाई): प्रशिक्षित आरोहकों को 6-10 सदस्यों के पंजीकृत उद्यम समूहों में संगठित करना, जिन्हें मोबिलिटी और तकनीकी औजार प्रदान किए जाते हैं।
केरा कौशल केंद्र: नारियल उप-उत्पादों (खोल, लकड़ी, रेशा) से हस्तशिल्प निर्माण हेतु 15 सदस्यीय समूहों को ₹2.67 लाख तक की अवसंरचनात्मक वित्तीय सहायता।
नीरा निष्कर्षण एवं प्रसंस्करण कार्यक्रम: गैर-किण्वित, शून्य-अल्कोहलिक पोषक पेय 'नीरा' के निष्कर्षण हेतु FPO आधारित 7-दिवसीय तकनीकी प्रशिक्षण।
8. मुख्य चुनौतियां एवं आगे की राह (Way Forward)
चुनौतियां:
पुराने व अनुत्पादक वृक्षों का उच्च अनुपात तथा कीट/रोग संक्रमण (उदा. रूट विल्ट रोग)।
वैश्विक मूल्य अस्थिरता और कोपरा की कीमतों में उतार-चढ़ाव।
पारंपरिक स्तर पर प्रसंस्करण इकाइयों और कोल्ड-चेन अवसंरचना का अभाव।
कुशल आरोहकों (Harvesters) की कमी।
आगे की राह:
एकीकृत कृषि और विविधीकरण: बस्तर मॉडल की तर्ज पर गैर-पारंपरिक राज्यों में बहुस्तरीय बागवानी को बढ़ावा देना।
FPO का सुदृढ़ीकरण: प्राथमिक प्रसंस्करण और प्रत्यक्ष विपणन केंद्रों के जरिए बिचौलियों की भूमिका कम करना।
R&D एवं जलवायु अनुकूलन: उच्च उपज और सूखा/रोग प्रतिरोधी ड्वार्फ किस्मों का बड़े पैमाने पर वितरण।
वैश्विक ब्रांडिंग: सक्रिय कार्बन और VCO जैसे उच्च-मांग वाले उत्पादों के लिए 'ब्रांड इंडिया' के तहत निर्यात मानकों को वैश्विक स्तर पर स्थापित करना।
9. यूपीएससी अभ्यास प्रश्न (Practice Questions)
प्रारंभिक परीक्षा (MCQ):
प्रश्न: नारियल उत्पादन और नीतियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
भारत वैश्विक नारियल उत्पादन में पहले स्थान पर है, जबकि क्षेत्रफल में तीसरे स्थान पर है।
भारत में तमिलनाडु नारियल के कुल क्षेत्रफल में सबसे आगे है, जबकि उत्पादकता में केरलम प्रथम स्थान पर है।
मिलिंग और बॉल कोपरा दोनों ही न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था के अंतर्गत आते हैं।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 1 और 3
(c) केवल 3
(d) 1, 2 और 3
(उत्तर: b)
मुख्य परीक्षा (Mains Question):
प्रश्न (GS Paper-3): "पारंपरिक बागवानी फसलों का विविधीकरण और मूल्य संवर्धन ग्रामीण आजीविका को सुदृढ़ करने के साथ-साथ कृषि निर्यात को गति प्रदान कर सकता है।" भारत के नारियल क्षेत्र और हालिया नीतिगत पहलों के संदर्भ में इस कथन का समालोचनात्मक मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द, 15 अंक)