"दिल्ली, ढाका और ड्रैगन: दक्षिण एशिया का नया रणनीतिक मोड़"
भारत, बांग्लादेश और चीन के बीच चल रहे कूटनीतिक बदलाव (Diplomatic Shifts) दक्षिण एशिया की पूरी भू-राजनीति को एक नया आकार दे रहे हैं। बांग्लादेश में हाल के राजनीतिक बदलावों के बाद, ढाका की विदेश नीति में एक स्पष्ट संतुलन (Balancing Act) बनाने की कोशिश देखी जा रही है, जहाँ वह एक तरफ चीन के साथ आर्थिक और रणनीतिक जुड़ाव बढ़ा रहा है, तो दूसरी तरफ भारत के साथ अपने अपरिहार्य (indispensable) भौगोलिक और ऐतिहासिक संबंधों को पूरी तरह पटरी पर लाने का प्रयास कर रहा है।
इस त्रिकोणीय कूटनीतिक बदलाव के मुख्य स्तंभ और हालिया घटनाक्रम निम्नलिखित हैं:
1. बांग्लादेश-चीन संबंधों में नया उछाल (The China Surge)
प्रधानमंत्री तारिक रहमान की हालिया बीजिंग यात्रा के बाद दोनों देशों के बीच संबंधों को "एक नए युग में साझा भविष्य के चीन-बांग्लादेश समुदाय" (China-Bangladesh Community of Shared Future in the New Era) के स्तर पर उन्नत (elevate) किया गया है।
रणनीतिक वार्ता और '2+2' तंत्र: दोनों देश अपने विदेश मंत्रियों के बीच एक स्थायी रणनीतिक वार्ता तंत्र स्थापित करने और रक्षा व कूटनीति को शामिल करते हुए एक '2+2' संवाद तंत्र तलाशने पर सहमत हुए हैं।
बहुपक्षीय मंचों पर समर्थन: चीन ने शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और BRICS (ब्रिक्स) में बांग्लादेश की भागीदारी का पुरजोर समर्थन किया है।
आर्थिक कॉरिडोर (CBMEC): चीन ने चीन-बांग्लादेश-म्यांमार आर्थिक गलियारे (CBMEC) को तेजी से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता जताई है। दिलचस्प बात यह है कि चीन ने इसमें भारत के शामिल होने के विकल्प को भी खुला रखा है।
तीस्ता परियोजना पर चीनी व्यवहार: मोंगला पोर्ट के आर्थिक क्षेत्र को अपने हाथ में लेने के साथ ही चीन ने बहुचर्चित तीस्ता नदी व्यापक प्रबंधन और बहाली परियोजना के व्यवहार्यता अध्ययन (feasibility study) में तेजी लाने की घोषणा की है।
2. भारत-बांग्लादेश संबंधों में सुधार और यथार्थवाद (The Delhi-Dhaka Thaw)
2024 के तख्तापलट के बाद भारत और बांग्लादेश के रिश्तों में जो ठहराव और कड़वाहट आई थी, वह अब कूटनीतिक प्रयासों के बाद धीरे-धीरे सामान्य हो रही है। दोनों देश इस वास्तविकता को समझ रहे हैं कि वे एक-दूसरे को नजरअंदाज नहीं कर सकते।
ऊर्जा और रसद सुरक्षा (Energy Security): हालिया पश्चिम एशिया (खाड़ी) संकट के दौरान, भारत ने बांग्लादेश को दैनिक ऊर्जा और डीजल की निर्बाध आपूर्ति जारी रखी, जिसने ढाका में एक बेहद सकारात्मक संदेश भेजा है। इसके अलावा, मैत्री सुपर थर्मल पावर प्रोजेक्ट और भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन दोनों देशों की दीर्घकालिक अंतर्निर्भरता (interdependence) को दर्शाते हैं।
डिजिटल व्यापार सुगमता (VINIMAY): दोनों देशों ने सीमा पार व्यापार में प्रशासनिक बाधाओं और कागजी कार्रवाई को कम करने के लिए लैंड पोर्ट मैनेजमेंट सिस्टम 'विनिमय' (VINIMAY) लॉन्च किया है।
वीजा प्रतिबंधों में ढील: भारत ने बांग्लादेशी नागरिकों के लिए चिकित्सा (medical) और व्यावसायिक (business) वीजा को प्री-2024 (2024 से पहले के) स्तर पर बहाल करना शुरू कर दिया है, जिससे लोगों के बीच आपसी संपर्क (People-to-People ties) मजबूत हो रहे हैं।
गंगा जल संधि 2026: वर्ष 1996 की ऐतिहासिक गंगा जल साझाकरण संधि की समय सीमा 2026 के अंत में समाप्त हो रही है। इसे नवीनीकृत करने और एक नए 'जलवायु और जल लचीलापन समझौते' पर बातचीत के लिए दोनों पक्ष सक्रिय हैं।
3. चीन का 'थर्ड-पार्टी' कार्ड और भारत की चिंताएं
इस पूरे त्रिकोणीय समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण बात चीन का कूटनीतिक रुख है:
बीजिंग का कूटनीतिक संयम: तीस्ता परियोजना और मोंगला पोर्ट पर आगे बढ़ते हुए चीनी विदेश मंत्रालय ने आधिकारिक तौर पर बयान दिया कि "चीन-बांग्लादेश सहयोग किसी तीसरे पक्ष (भारत) को लक्षित नहीं करता है और इसे तीसरे पक्ष के प्रभाव से मुक्त होना चाहिए।" विश्लेषकों के अनुसार, चीन तीस्ता या मोंगला को भारत-चीन प्रतिद्वंद्विता का नया अखाड़ा नहीं बनाना चाहता, इसलिए वह संभलकर बयान दे रहा है।
भारत का सुरक्षा दृष्टिकोण: चीन भले ही इसे केवल आर्थिक और बुनियादी ढांचागत निवेश कहे, लेकिन नई दिल्ली इसे सुरक्षा और सामरिक चश्मे से ही देखेगी। सिलीगुड़ी कॉरिडोर (चिकन नेक) के करीब तीस्ता परियोजना में चीनी इंजीनियरों की मौजूदगी और मोंगला पोर्ट पर चीनी पकड़ भारत की 'नेबरहुड फर्स्ट' (Neighborhood First) नीति और हिंद महासागर क्षेत्र (IOR) में उसकी सुरक्षा व्यवस्था के लिए एक निरंतर चुनौती बनी हुई है।
मुख्य निष्कर्ष (Core Takeaway): बांग्लादेश के लिए भूगोल एक स्थायी वास्तविकता है, जिसके कारण वह भारत से पूरी तरह दूर नहीं हो सकता। लेकिन अपनी आर्थिक आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उसे चीनी निवेश की भी जरूरत है। यह कूटनीतिक बदलाव इस बात की परीक्षा है कि ढाका अपनी संप्रभुता को बनाए रखते हुए दिल्ली की सुरक्षा चिंताओं और बीजिंग की आर्थिक ताकत के बीच कितना कुशल संतुलन बना पाता है।