Saturday, August 2, 2025

STEM में लैंगिक अंतर: कक्षा से करियर तक की चुनौती

 

STEM में लैंगिक अंतर: कक्षा से करियर तक की चुनौती

✍️ प्रासंगिक विश्लेषण — UPSC मुख्य परीक्षा हेतु


परिचय

आज के समय में जहाँ लड़कियाँ STEM (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अभियांत्रिकी और गणित) शिक्षा में बड़ी संख्या में नामांकित हो रही हैं, वहीं करियर स्तर पर उनका प्रतिनिधित्व निराशाजनक रूप से कम है। यह केवल आँकड़ों का असंतुलन नहीं है, बल्कि सामाजिक, संस्थागत और मनोवैज्ञानिक बाधाओं का परिणाम है। वैश्विक और भारतीय परिप्रेक्ष्य में STEM में महिलाओं की भागीदारी की यह खाई नीति और दृष्टिकोण में बदलाव की माँग करती है।


वैश्विक और भारतीय परिदृश्य

  • UNESCO के अनुसार, दुनिया भर में STEM स्नातकों में महिलाओं की हिस्सेदारी केवल 35% है — यह आंकड़ा पिछले एक दशक से स्थिर है।

  • कार्यक्षेत्र में स्थिति और भी चिंताजनक है:

    • डेटा साइंस और AI में केवल 26% महिलाएँ

    • इंजीनियरिंग में 15%

    • क्लाउड कंप्यूटिंग में मात्र 12%

  • भारत में, STEM उच्च शिक्षा में लगभग 40% नामांकन लड़कियों का है, लेकिन कार्यक्षेत्र में यह आंकड़ा सिर्फ 14–27% तक सिमट जाता है (स्रोत: विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय)।


प्रमुख बाधाएँ: STEM से बाहर क्यों हो जाती हैं लड़कियाँ?

1. सामाजिक मान्यताएँ और परंपरागत भूमिकाएँ

  • अब भी STEM को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता है।

  • अभिभावक, शिक्षक और समाज अक्सर लड़कियों को “सुरक्षित” करियर जैसे चिकित्सा या शिक्षण की ओर मोड़ते हैं।

2. मार्गदर्शन और प्रेरणा की कमी

  • स्कूलों और कॉलेजों में महिला वैज्ञानिकों या इंजीनियरों के सफल उदाहरण कम दिखाए जाते हैं।

  • रीतू करिधल और टेसी थॉमस जैसी प्रेरणादायक महिलाएँ छात्रों तक नहीं पहुँच पातीं।

3. वैवाहिक और पारिवारिक जीवन के दौरान सहयोग की कमी

  • विवाह, मातृत्व और सामाजिक जिम्मेदारियों के कारण STEM क्षेत्र से बाहर निकल जाना आम हो जाता है।

4. शिक्षा के प्रारंभिक स्तर पर भेदभाव

  • कक्षा में लड़कों को तकनीकी प्रश्नों के लिए अधिक चुना जाता है, जबकि लड़कियाँ केवल “सहायक” भूमिकाओं तक सीमित रह जाती हैं।

  • इससे लड़कियों में आत्मविश्वास और STEM में रुचि घट जाती है।


स्कूल व्यवस्था: समाधान की कुंजी

आत्म-विश्वास का निर्माण स्कूल से शुरू होता है

  • यदि प्रारंभिक स्तर पर ही यह संकेत मिल जाए कि “विज्ञान लड़कों का विषय है,” तो लड़कियाँ STEM को अपना विकल्प ही नहीं मानतीं।

शिक्षकों की भूमिका निर्णायक

  • राजस्थान के एक सरकारी स्कूल में STEM पर लैंगिक समावेशन आधारित प्रशिक्षण के बाद विज्ञान प्रदर्शनियों में लड़कियों की भागीदारी एक वर्ष में दोगुनी हो गई।

  • कक्षा में महिला वैज्ञानिकों की झलक दिखाने से लड़कियों में जिज्ञासा बढ़ी।

शिक्षक प्रशिक्षण में लैंगिक चेतना जरूरी

  • प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन द्वारा किए गए एक अध्ययन में पाया गया कि प्रशिक्षण के बाद STEM क्लब में लड़कियों की भागीदारी 46% तक बढ़ी।


नीतिगत सुझाव

  1. B.Ed. पाठ्यक्रम में Gender-Sensitive Pedagogy को अनिवार्य करना

  2. “STEM में बेटियाँ” जैसे राष्ट्रीय परामर्श कार्यक्रमों की शुरुआत

  3. लड़कियों के लिए रोल मॉडल के रूप में महिला वैज्ञानिकों को कक्षा में शामिल करना

  4. ग्रामीण स्कूलों में विज्ञान क्लब, कोडिंग कार्यशालाएँ और प्रतियोगिताएँ

  5. CSR के तहत ग्रामीण लड़कियों के लिए STEM फेलोशिप योजनाएँ


निष्कर्ष

भारत यदि नवाचार और समावेशन में वैश्विक नेतृत्व चाहता है, तो STEM में लैंगिक असमानता को समाप्त करना अत्यंत आवश्यक है। यह केवल सामाजिक न्याय का प्रश्न नहीं, बल्कि राष्ट्रीय विकास का आधार भी है।

“नामांकन से आगे सोचें — आत्मविश्वास, परामर्श और समर्थन के साथ लड़कियों को करियर तक पहुँचाना ही असली समावेशन है।”

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