Monday, June 1, 2026

Locked Up & Overcrowded: Decoding India’s Perennial Prison Crisis

 

Locked Up & Overcrowded: Decoding India’s Perennial Prison Crisis 

If you are preparing for GS Paper II (Governance & Polity) or GS Paper III (Internal Security), the National Crime Records Bureau's (NCRB) Prison Statistics India report is pure gold for your Mains answer writing.

While a quick glance at the latest data shows a superficial victory—India's prison occupancy rate dropped to a decade-low of 112.7%—scratching the surface reveals a deep-seated institutional crisis.

For an aspiring civil servant, understanding the mechanics of this crisis isn't just about memorizing stats; it is about analyzing the structural failures of our Criminal Justice System. Let’s break down the data into highly scoring Mains dimensions.

1. The Paradox of "Decade-Low" Overcrowding

Under the Seventh Schedule of the Constitution, 'Prisons' fall squarely under the State List (List II). This decentralized management has led to a massive divergence in how states handle jail infrastructure.

  • The Macro Strain: India has 1,333 jails with a sanctioned capacity of 4.53 lakh inmates. However, they house over 5.11 lakh individuals.

  • The Domino Effect: As noted by the Parliamentary Standing Committee report ('Prison– Conditions, Infrastructure and Reforms'), keeping prisons perpetually over-capacity causes a severe breakdown of resources. It compromises basic human dignity (violating Article 21), heightens inmate violence, and completely derails healthcare and rehabilitation efforts.

2. Spatial Asymmetry: A Tale of Two Extrems

A national average of 112.7% is highly misleading because more than half of India's States and UTs are operating well past their breaking points.

[PRISON OCCUPACY RATES]
Delhi:                 ███████████████████ 194%
Jammu & Kashmir:       ██████████████ 148%
National Average:      ███████ 112.7%
  • The Red Zones: Delhi remains the most congested prison system in the country at a staggering 194% occupancy rate. Jammu & Kashmir has seen an alarming surge, skyrocketing from a mere 78% occupancy in 2015 to 148%.

  • The Silver Linings: On the flip side, targeted interventions work. Chhattisgarh successfully slashed its crushing 2015 occupancy rate of 234% down to 127.6% through strategic capacity expansions and fast-tracking cases.

3. The Root Cause: A System run by "Undertrials"

If you are asked to identify the single biggest clog in India's judicial pipeline, it is the disproportionate population of undertrials (inmates awaiting trial).

The 73% Trap: Nearly 3 out of every 4 prisoners in India have not been convicted of any crime.

While this is down from the pandemic peak of 77% in 2021, it remains higher than pre-COVID levels. Concurrently, the share of actual convicted prisoners has shrunk from 32% (2016) to just 26.6%.

  • The Worst Hit: In 14 States and UTs, the undertrial population beats the national average. Delhi and Bihar top this grim list, where a staggering 87%+ of all inmates are undertrials—representing a systemic failure of the bail system, a shortage of judges, and delayed investigations.

4. The Administrative Blindspot: Ghost Staffing

You cannot reform criminals if you do not have the staff to supervise them. The Parliamentary Committee flagged staff vacancies as the most neglected aspect of Indian prison administration.

  • The Double Whammy: Shockingly, the regions facing the highest overcrowding and undertrial burdens are also facing the worst staffing droughts.

  • The Stat to Quote: In 8 States/UTs, nearly half of all sanctioned posts are vacant. In Delhi and Jammu & Kashmir, over 60% of sanctioned prison staff positions sit empty. This directly compromises security and eliminates any scope for psychological counseling or correctional reform.

5. Way Forward: Framework for Your Mains Answers

When writing your conclusion or way-forward section, always look for structural, policy-driven solutions. You can channel the recommendations of the Parliamentary Committee:

  • Legal Aid and Decarceration: Strict implementation of Section 479 of the Bharatiya Nagarik Suraksha Sanhita (BNSS) [formerly Sec 436A CrPC], which mandates releasing undertrials who have served half of their maximum potential prison term on a personal bond.

  • Infrastructure Rationalization: Capitalizing on the 24% capacity expansion seen since 2015 by building more modern barracks and executing inter-prison transfers from choked urban jails to under-utilized rural prisons.

  • Institutionalizing Open Prisons: Expanding the "Open Prison" model for low-risk, well-behaved convicts to drastically reduce pressure on high-security traditional jails.

  • Filling the Personnel Void: Fast-tracking time-bound recruitment drives for prison guards, medical professionals, and reform officers to restore administrative balance.

भू-राजनीतिक बिसात पर 'क्रिटिकल मिनरल्स': भारत-कनाडा रणनीतिक गठजोड़ और वैश्विक 'खनिज सुरक्षा साझेदारी' (MSP) का नया क्षितिज

 

21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था में एक मौन लेकिन अत्यंत तीव्र बदलाव आ रहा है। जिस तरह 20वीं सदी में 'खाड़ी के तेल' ने वैश्विक भू-राजनीति और आर्थिक महाशक्तियों का निर्धारण किया था, ठीक उसी तरह आज 'क्रिटिकल मिनरल्स' (महत्वपूर्ण खनिज) आधुनिक औद्योगिक संप्रभुता, हरित ऊर्जा संक्रमण और राष्ट्रीय सुरक्षा के नए 'रणनीतिक ईंधन' बन चुके हैं। हाल ही में कनाडा के प्रधान मंत्री मार्क कारनी की भारत यात्रा और वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल की कनाडा यात्रा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दोनों लोकतांत्रिक देश व्यापार और निवेश से आगे बढ़कर एक गहरे भू-रणनीतिक साझेदारी की ओर बढ़ रहे हैं, जिसके केंद्र में ऊर्जा सुरक्षा और लचीली आपूर्ति श्रृंखलाएं (Resilient Supply Chains) हैं.

यह आलेख वैश्विक आर्थिक कूटनीति, घरेलू पहलों (जैसे KABIL) और 'खनिज सुरक्षा साझेदारी' (MSP) के मंच पर भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का एक संपूर्ण 360-डिग्री विश्लेषण प्रस्तुत करता है।

1. क्रिटिकल मिनरल्स: आधुनिक तकनीक और सुरक्षा की रीढ़

लिथियम, कोबाल्ट, ग्रेफाइट, निकल और रेयर अर्थ एलिमेंट्स (REEs) जैसी महत्वपूर्ण सामग्रियां कोई सामान्य खनिज नहीं हैं। भारत के 2070 तक नेट-जीरो (Net-Zero) कार्बन उत्सर्जन के महत्वाकांक्षी लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यह खनिज अपरिहार्य हैं। इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) की बैटरी, सौर पैनल, सेमीकंडक्टर चिप्स, रक्षा उपकरण और उन्नत दूरसंचार प्रणालियों का निर्माण पूरी तरह इन्हीं पर निर्भर है।

वर्तमान में इस क्षेत्र की सबसे बड़ी चुनौती इसकी आपूर्ति श्रृंखला का अत्यधिक केंद्रीकृत होना है। वैश्विक क्रिटिकल मिनरल्स की प्रोसेसिंग और रिफाइनिंग पर चीन का लगभग 60-70% एकाधिकार है। ऐसे में, किसी भी भू-राजनीतिक तनाव की स्थिति में 'खनिज ब्लैकमेलिंग' से बचने और अपनी आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए भारत अपनी निर्भरता को डाइवर्सिफाई (विविध) करना चाहता है।

[कनाडा की प्रचुरता] [भारत की तीव्र मांग]
- लिथियम, कोबाल्ट, निकल के भंडार - 'मेक इन इंडिया' और इलेक्ट्रॉनिक्स क्रांति
- उन्नत टिकाऊ खनन तकनीक - इलेक्ट्रिक वाहन (EV) और बैटरी मैन्युफैक्चरिंग
- यूरेनियम (असैन्य परमाणु ऊर्जा) - नेट-जीरो (Net-Zero) 2070 का राष्ट्रीय लक्ष्य
└───► [रणनीतिक पूरकता एवं ऊर्जा सुरक्षा] ◄───┘

2. भारत-कनाडा रणनीतिक पूरकता और CEPA का पुनरुद्धार

कनाडा खनिज और संसाधन के मामले में दुनिया के सबसे समृद्ध देशों में से एक है, जबकि भारत दुनिया का सबसे तेजी से बढ़ता उपभोक्ता और विनिर्माण बाजार है। यह समीकरण दोनों देशों के बीच एक प्राकृतिक आर्थिक पूरकता (Economic Complementarity) पैदा करता है:

  • व्यापारिक महत्वाकांक्षा: दोनों देशों ने वर्ष 2026 के अंत तक व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौते (CEPA) को अंतिम रूप देने और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को $50 बिलियन तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा है।

  • ऊर्जा सुरक्षा का नया अध्याय: कनाडा के पास मौजूद उच्च गुणवत्ता वाले यूरेनियम के भंडार भारत के असैन्य परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम के लिए निरंतर 'बेस-लोड' स्वच्छ ऊर्जा सुनिश्चित करते हैं। इसके अतिरिक्त, कनाडा की हिंद-प्रशांत रणनीति में भारत को केंद्रीय स्थान देना यह दर्शाता है कि दोनों देश एक 'मुक्त, खुले और नियम-आधारित' हिंद-प्रशांत क्षेत्र के पक्षधर हैं.

3. कूटनीति से जमीनी हकीकत तक: KABIL की वैश्विक पहुंच

विदेशी धरती पर इन रणनीतिक खनिजों के अधिग्रहण के लिए भारत सरकार ने 2019 में 'खनिज बिदेश इंडिया लिमिटेड' (KABIL) की स्थापना की। यह NALCO, HCL और MECL का एक संयुक्त उद्यम है।

  • ऐतिहासिक सफलता (अर्जेंटीना): KABIL ने अर्जेंटीना की सरकारी कंपनी CAMYEN के साथ एक ऐतिहासिक समझौता करके कैटामार्का प्रांत में 5 लिथियम ब्लॉकों के अन्वेषण और विकास का विशेष अधिकार प्राप्त किया। यह भारत की रणनीतिक खनिज कूटनीति की पहली बड़ी वैश्विक जीत थी।

  • घरेलू सुधार: विदेशों में पैर जमाने के साथ-साथ भारत ने घरेलू मोर्चे पर भी खान और खनिज (MMDR) संशोधन अधिनियम, 2023 के माध्यम से लिथियम सहित 6 परमाणु खनिजों को प्रतिबंधित सूची से हटाकर निजी क्षेत्र के लिए खनन के रास्ते खोल दिए हैं, ताकि आत्मनिर्भरता को बल मिले।

4. 'खनिज सुरक्षा साझेदारी' (MSP): एलिट क्लब में भारत का प्रवेश

जून 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) के नेतृत्व वाले खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) में भारत का शामिल होना उसकी आर्थिक कूटनीति का टर्निंग पॉइंट माना जा सकता है।

कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, जापान, दक्षिण कोरिया और यूरोपीय संघ जैसे तकनीकी रूप से उन्नत देशों के इस विशिष्ट समूह में शामिल होने वाला भारत एकमात्र विकासशील देश है। जिस तरह 'क्वाड' (QUAD) हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करता है, उसी तरह 'MSP' भारत के औद्योगिक भविष्य के लिए एक 'आर्थिक सुरक्षा कवच' का काम करता है।

MSP से भारत को होने वाले प्रमुख लाभ:

  1. तकनीक हस्तांतरण (Tech Transfer): खनन के साथ-साथ खनिजों की पर्यावरण-अनुकूल रिफाइनिंग की अत्याधुनिक पश्चिमी तकनीक तक भारत की पहुंच सुलभ होगी।

  2. संयुक्त वित्तीय निवेश: KABIL अब अकेले बड़े वित्तीय जोखिम लेने के बजाय MSP के विशाल आर्थिक संसाधनों का उपयोग करके अफ्रीका और दक्षिण अमेरिका में खदानों का सह-अधिग्रहण (Co-investment) कर सकेगा।

5. चुनौतियाँ और आगे की राह (Way Forward)

भविष्य की इस सुनहरी तस्वीर के बीच कुछ वास्तविक नीतिगत चुनौतियां भी मौजूद हैं। विकसित देशों (जैसे कनाडा और अमेरिका) के सख्त पर्यावरणीय और श्रम मानक कभी-कभी विकासशील देशों के विनिर्माण की गति के साथ टकराते हैं। इसके अलावा, भारत-कनाडा संबंधों में आने वाले कूटनीतिक उतार-चढ़ाव रणनीतिक समझौतों की निरंतरता को प्रभावित करते हैं.

निष्कर्ष:

21वीं सदी में भारत को अपनी भू-राजनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने के लिए एक बहुआयामी दृष्टिकोण अपनाना होगा:

  • संप्रभु धन कोष (Sovereign Wealth Fund): विदेशों में खदानों के त्वरित और आक्रामक अधिग्रहण के लिए कतर या सिंगापुर की तर्ज पर एक समर्पित राष्ट्रीय कोष बनाना होगा।

  • फास्ट-ट्रैक कॉरिडोर: कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे विश्वसनीय भागीदारों के साथ आगामी व्यापार समझौतों (जैसे CEPA) में क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति के लिए एक विशेष, निर्बाध मार्ग तैयार करना चाहिए।

अंततः, खनिज सुरक्षा साझेदारी (MSP) के मंच का रणनीतिक उपयोग और कनाडा जैसे संसाधनों से भरपूर 'स्वाभाविक सहयोगियों' के साथ कूटनीतिक संतुलन बनाकर ही भारत आगामी डिजिटल और हरित औद्योगिक क्रांति में स्वयं को एक वैश्विक महाशक्ति के रूप में स्थापित कर सकता है।

विकास, पहचान और कॉर्पोरेट दबाव: 21वीं सदी में भारतीय आदिवासी का अस्तित्व

 

हाल ही में नई दिल्ली के लाल किला मैदान में आयोजित 'जनजातीय सांस्कृतिक समागम' ने भारत के मूल निवासियों—आदिवासियों—के भविष्य को लेकर एक नई राष्ट्रीय बहस को जन्म दे दिया है। भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के उपलक्ष्य में आयोजित इस समागम में उठी मांगों, विशेषकर धर्म परिवर्तन कर चुके आदिवासियों को अनुसूचित जनजाति (ST) की सूची से बाहर करने यानी 'डीलिस्टिंग' (Delisting) की मांग ने देश के कानूनी, सामाजिक और विकासवादी ढांचे के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

2011 की जनगणना के अनुसार, भारत में लगभग 10.42 करोड़ आदिवासी हैं, जो देश की कुल आबादी का 8.6% हैं। आज यह विशाल आबादी पहचान की राजनीति, संवैधानिक अधिकारों और तीव्र औद्योगिक विकास के त्रिकोणीय चौराहे पर खड़ी है।

1. पहचान का संवैधानिक बनाम सांस्कृतिक द्वंद्व

इस पूरी बहस के केंद्र में 'आदिवासी' पहचान की बुनियादी परिभाषा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े संगठनों जैसे जनजाति सुरक्षा मंच (JSM) का तर्क है कि आदिवासी संस्कृति मूलतः प्रकृति पूजक और 'सनातन परिवार' का हिस्सा है। उनका दावा है कि ईसाई या अन्य संगठित धर्मों में परिवर्तित होने के बाद आदिवासी अपनी पारंपरिक रूढ़ियों और विशिष्ट संस्कृति को खो देते हैं। चूंकि 'विशिष्ट संस्कृति' ही संविधान के तहत ST का दर्जा मिलने का मुख्य आधार है, इसलिए संस्कृति बदलने पर यह कानूनी सुरक्षा भी समाप्त होनी चाहिए।

इसके विपरीत, भारत का संवैधानिक और न्यायिक ढांचा एक बिल्कुल अलग और स्पष्ट दृष्टिकोण रखता है।

  • अनुच्छेद 342 बनाम अनुच्छेद 341: 1950 का राष्ट्रपति आदेश अनुसूचित जातियों (SC) के लिए हिंदू, सिख या बौद्ध धर्म तक ही आरक्षण को सीमित करता है (अनुच्छेद 341)। लेकिन अनुच्छेद 342 (जो Scheduled Tribes को परिभाषित करता है) में धर्म का कोई उल्लेख नहीं है। आदिवासियों की पहचान उनके भौगोलिक अलगाव, विशिष्ट जीवनशैली और सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन पर आधारित है।

  • न्यायिक मिसाल: वर्ष 1963 के ऐतिहासिक 'कार्तिक उरांव बनाम मुस्तफा उरांव' मामले में पटना उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि "जनजातीय पहचान धर्म-आधारित नहीं है, बल्कि यह नस्लीय और सामुदायिक संबंधों पर टिकी है।" अदालत ने माना था कि ईसाई उरांव भी अपनी जनजातीय परंपराओं का पालन करते हैं, इसलिए वे "पहले उरांव हैं और बाद में ईसाई"।

  • सरना कोड की मांग: धार्मिक पहचान का यह मुद्दा तब और जटिल हो जाता है जब झारखंड और छत्तीसगढ़ के गैर-ईसाई आदिवासी भी खुद को हिंदू मानने से इनकार करते हैं। वे लंबे समय से जनगणना में अपने पारंपरिक प्रकृति-पूजक विश्वास के लिए एक अलग 'सरना धर्म कोड' की मांग कर रहे हैं, जो उनकी स्वतंत्र पहचान को रेखांकित करता है।

2. सामाजिक न्याय और आर्थिक अधिकारों का असंतुलन

डीलिस्टिंग की मांग के पीछे केवल सांस्कृतिक तर्क नहीं हैं, बल्कि इसके पीछे एक गहरी व्यावहारिक और आर्थिक चिंता भी है।

सकारात्मक कार्रवाई (Affirmative Action) के आलोचकों का तर्क है कि जो आदिवासी परिवार ईसाई मिशनरियों के संपर्क में आकर शिक्षा और आर्थिक रूप से अधिक सक्षम हो चुके हैं, वे आरक्षण (नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों) तथा कल्याणकारी योजनाओं के बड़े हिस्से पर कब्जा कर लेते हैं। इसके कारण दूरदराज के जंगलों में रहने वाले और अपने पारंपरिक धर्म का पालन करने वाले अत्यधिक पिछड़े आदिवासी (जैसे विशेष रूप से कमजोर जनजातीय समूह - PVTGs) वंचित रह जाते हैं।

यह स्थिति जनजातीय समाज के भीतर ही 'मलाईदार परत' (Creamy Layer) और आंतरिक वर्गीकरण (Sub-categorization) की नीतिगत बहस को जन्म देती है, ठीक वैसी ही जैसी अनुसूचित जातियों (SC) के भीतर उप-वर्गीकरण को लेकर चल रही है।

3. 'जल, जंगल, जमीन' बनाम कॉर्पोरेट विकास: वास्तविक संकट

धार्मिक और सांस्कृतिक पहचान के राजनीतिक शोर में आदिवासियों के अस्तित्व से जुड़े सबसे बुनियादी मुद्दे अक्सर पीछे छूट जाते हैं। देश की ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक विकास के लिए खनन परियोजनाएं आवश्यक हैं, लेकिन इसकी सबसे भारी कीमत आदिवासियों को अपने विस्थापन और पर्यावरण विनाश के रूप में चुकानी पड़ती है।

वर्तमान में इसके दो सबसे बड़े ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने हैं:

  • हसदेव अरण्य (छत्तीसगढ़): "मध्य भारत के फेफड़े" कहे जाने वाले 1,70,000 हेक्टेयर के इस समृद्ध वन क्षेत्र में कोयला खनन के लिए वन विभाग द्वारा घने जंगलों को डायवर्ट करने की सिफारिश की गई। सामाजिक कार्यकर्ताओं के अनुसार, इस परियोजना (केन्टे एक्सटेंशन और Parsa कोयला ब्लॉक) के लिए लगभग 6 लाख पेड़ों को काटने की योजना है। इससे न केवल पर्यावरण नष्ट हो रहा है, बल्कि वहां रहने वाले गोंड और उरांव आदिवासियों की आजीविका भी छिन रही है, जिनकी 60-70% आय वनोपज से आती है।

  • सिजीमाली और रायगड़ा (ओडिशा): यहाँ की स्थानीय जनजातियाँ अपने पवित्र पहाड़ों को बॉक्साइट खनन परियोजनाओं से बचाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रही हैं।

कानूनी उल्लंघन: इन दोनों ही मामलों में आरोप हैं कि पेसा अधिनियम (PESA), 1996 और वन अधिकार अधिनियम (FRA), 2006 के तहत अनिवार्य ग्राम सभा की पूर्व-सहमति को या तो पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया या फर्जी हस्ताक्षरों के सहारे कागजी औपचारिकता पूरी कर ली गई।

4. विकास का भयानक सच: खाखा समिति के आंकड़े

प्रो. वर्जिनियस खाखा की अध्यक्षता वाली उच्च स्तरीय समिति (Xaxa Committee Report, 2014) ने भारत के आदिवासियों की स्थिति का जो प्रामाणिक डेटा प्रस्तुत किया था, वह आज भी उतना ही सच है:

  • विस्थापन का बोझ: खाखा समिति के अनुसार, स्वतंत्रता के बाद से बांधों, खदानों और औद्योगिक परियोजनाओं के कारण विस्थापित होने वाले कुल लोगों में से लगभग 40% लोग आदिवासी थे, जबकि आबादी में उनकी हिस्सेदारी मात्र 8% के करीब थी।

  • संसाधन संपन्न लेकिन गरीब: विडंबना यह है कि ओडिशा और झारखंड जैसे राज्य, जहां देश के 60-80% प्रमुख खनिज संसाधन हैं, वहीं आदिवासियों में गरीबी का अनुपात सबसे अधिक है। 45.3% ग्रामीण आदिवासी गरीबी रेखा के नीचे (BPL) जीवन यापन कर रहे थे, जबकि राष्ट्रीय औसत इससे बहुत कम था।

  • असंतोष और आंतरिक सुरक्षा: खाखा रिपोर्ट ने स्पष्ट किया था कि देश के जिन 83 जिलों को वामपंथी उग्रवाद (नक्सलवाद) से प्रभावित माना गया था, उनमें से 42 जिले 'संवैधानिक पांचवीं अनुसूची' (Scheduled Areas) के अंतर्गत आते हैं। यह दर्शाता है कि भूमि की बेदखली और प्रशासनिक उपेक्षा सीधे तौर पर आंतरिक सुरक्षा के संकट को जन्म देती है।

   [प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर जनजातीय क्षेत्र]
                     │
                     ▼ (तीव्र औद्योगिक मांग)
   [PESA / FRA कानूनों का प्रशासनिक उल्लंघन]
                     │
                     ▼ (परिणाम)
   [40% विस्थापन का बोझ + 45% से अधिक गरीबी दर]
                     │
                     ▼ (असंतोष का लाभ)
   [42 अनुसूचित जिलों में वामपंथी उग्रवाद (LWE) का प्रसार]

5. आगे की राह: 'मध्यम मार्ग' और समावेशी न्याय

21वीं सदी के भारत को आदिवासियों के प्रति अपने दृष्टिकोण में 'पैटर्नलिस्टिक' (जहाँ बाहरी लोग तय करें कि आदिवासियों के लिए क्या सही है) मॉडल से बाहर निकलकर 'पार्टिसिपेटरी' (भागीदारी आधारित) मॉडल अपनाना होगा।

  1. कानून के शासन की सर्वोच्चता: जब तक संसद या देश की सर्वोच्च अदालत अनुसूचित जनजातियों की संवैधानिक परिभाषा में कोई बदलाव नहीं करती, तब तक सामाजिक स्तर पर कोई भी विभाजनकारी या हिंसक अभियान (जैसे ईसाई आदिवासियों का सामाजिक बहिष्कार या कब्रों से शव निकालना) स्वीकार नहीं किया जा सकता। यह देश के आंतरिक ताने-बाने के लिए घातक है।

  2. डाटा-आधारित नीतिगत सुधार: यदि आरक्षण के लाभों के वितरण में कोई विसंगति है, तो रोहिणी आयोग की तर्ज पर एक स्वतंत्र विशेषज्ञ पैनल का गठन किया जाना चाहिए। यह पैनल वैज्ञानिक डेटा के आधार पर तय करे कि सकारात्मक कार्रवाई का लाभ सबसे पिछड़े और अंतिम पायदान पर खड़े आदिवासी (जैसे PVTGs) तक कैसे पहुंचे, न कि इसे धार्मिक ध्रुवीकरण का हथियार बनाया जाए।

  3. ग्राम सभाओं को वास्तविक 'वीटो पावर': जैसा कि खाखा समिति ने सुझाव दिया था, पांचवीं और छठी अनुसूची के क्षेत्रों में भूमि अधिग्रहण के मामलों में ग्राम सभाओं को अंतिम 'वीटो' अधिकार मिलना चाहिए। 'वैज्ञानिक वन प्रबंधन' के नाम पर स्थानीय समुदायों की आवाज को दबाना बंद करना होगा।

भारत की सांस्कृतिक विविधता की खूबसूरती इस बात में है कि एक आदिवासी 'राम' को पूजे, 'यीशु' को पूजे या अपने पारंपरिक 'सगा देव' और प्रकृति की आराधना करे—उसका 'आदिवासीपन' और उसके अधिकार अक्षुण्ण रहने चाहिए। आदिवासियों का वास्तविक सशक्तीकरण उन्हें आपस में धार्मिक आधार पर बांटने से नहीं, बल्कि उन्हें उनके 'जल, जंगल, जमीन' का हकदार बनाकर और विकास की मुख्यधारा में समान भागीदार बनाकर ही संभव होगा।

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