क्या राज्यपालों को समयबद्ध तरीके से बिलों पर कार्रवाई करनी चाहिए? — राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांगी गई
— Suryavanshi IAS द्वारा विश्लेषण
📌 "संविधान मौन को नहीं, उत्तरदायित्व को प्राथमिकता देता है। लोक इच्छा की अवहेलना लोकतंत्र में अस्वीकार्य है।"
🔍 विषय क्या है?
22 जुलाई, 2025 को राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने सुप्रीम कोर्ट से यह सलाह मांगी कि क्या राज्यपाल और राष्ट्रपति को राज्य विधायिका द्वारा पारित विधेयकों पर निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई करने के लिए न्यायिक रूप से बाध्य किया जा सकता है?
यह अनुरोध 8 अप्रैल के ऐतिहासिक फैसले के बाद किया गया जिसमें तमिलनाडु के राज्यपाल द्वारा बिलों पर जानबूझकर की गई देरी को गैरकानूनी बताया गया था।
📜 क्या होता है Presidential Reference? (अनुच्छेद 143)
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अनुच्छेद 143(1) के तहत राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट से सलाह मांग सकते हैं, यदि कोई महत्वपूर्ण कानूनी या तथ्यात्मक प्रश्न उत्पन्न हुआ हो।
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सुप्रीम कोर्ट इसे स्वेच्छा से स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है।
🧾 महत्वपूर्ण उदाहरण:
1993 में अयोध्या विवाद पर राष्ट्रपति की सलाह को सुप्रीम कोर्ट ने अस्वीकार किया था क्योंकि यह सांप्रदायिकता और लंबित मुकदमे से जुड़ा था।
⚖️ क्या सुप्रीम कोर्ट की सलाह बाध्यकारी होती है?
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नहीं। अनुच्छेद 143(1) के तहत दी गई राय बाध्यकारी नहीं होती।
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अनुच्छेद 141 केवल उन फैसलों को बाध्यकारी बनाता है जो न्यायिक क्षेत्राधिकार में दिए गए हों।
📝 St. Xavier's College बनाम गुजरात राज्य (1974) में अदालत ने स्पष्ट किया कि advisory opinion केवल मार्गदर्शक होती है, न कि binding precedent.
हालाँकि, R.K. Garg बनाम भारत संघ (1981) में न्यायमूर्ति भगवती ने एक राय को विधिक दृष्टांत की तरह मान लिया, जिससे विषय में कुछ अस्पष्टता बनी रहती है।
🧩 क्या इस Reference से 8 अप्रैल के निर्णय को पलटा जा सकता है?
नहीं।
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि Article 143 का उपयोग पूर्व में दिए गए न्यायिक निर्णयों को पलटने के लिए नहीं किया जा सकता।
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Cauvery जल विवाद में कोर्ट ने कहा था कि यदि एक विषय पर पहले निर्णय हो चुका है, तो उसे राष्ट्रपति राय के माध्यम से पुनः नहीं खोला जा सकता।
🛠️ फिर भी, कुछ उदाहरणों में स्पष्टीकरण या कार्यपद्धति में सुधार हुआ है:
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1998 में राष्ट्रपति की सलाह पर कोलेजियम प्रणाली की रचना में बदलाव किया गया, बिना 1993 के निर्णय को पलटे।
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2012 में 2G स्पेक्ट्रम मामले के बाद, Natural Resources Allocation Reference में कोर्ट ने नीति स्पष्ट की, लेकिन मूल निर्णय को बरकरार रखा।
📌 अतः 8 अप्रैल का फैसला अंतिम रहेगा, लेकिन उसकी व्याख्या या विस्तार वर्तमान संविधान पीठ कर सकती है।
🧭 प्रशासन और संघवाद पर प्रभाव
✅ 8 अप्रैल के निर्णय की मुख्य बातें:
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राज्यपाल अनिश्चितकाल तक बिल लंबित नहीं रख सकते।
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समय-सीमा में कार्यवाही संवैधानिक रूप से वैध है।
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राज्य विधायिका की सर्वोच्चता को मान्यता दी गई।
❗ अब राष्ट्रपति की चिंता:
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क्या न्यायपालिका संवैधानिक पदों पर समयबद्ध कार्रवाई थोप सकती है?
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इससे शक्ति पृथक्करण और संघीय व्यवस्था की सीमाएं प्रश्न में आ जाती हैं।
📚 UPSC तैयारी के लिए मुख्य बिंदु
📘 GS Paper II – संविधान और शासन:
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अनुच्छेद 200, 201 — विधेयक पर राज्यपाल की भूमिका
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अनुच्छेद 143 — राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से राय
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शक्ति पृथक्करण सिद्धांत
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संघीय ढांचे में केंद्र-राज्य संबंध
📘 GS Paper IV – नैतिकता:
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सार्वजनिक उत्तरदायित्व और संवैधानिक कर्तव्य
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नैतिक प्रशासन बनाम राजनीतिक मंशा
📝 निबंध संभावित विषय:
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"संवैधानिक मौन बनाम न्यायिक हस्तक्षेप"
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"संघवाद में न्यायपालिका की भूमिका: एक सीमित या सक्रिय संरक्षक?"
🔚 निष्कर्ष:
"संविधान पद नहीं, उत्तरदायित्व देता है।"
राष्ट्रपति द्वारा सुप्रीम कोर्ट से राय माँगना एक संवैधानिक प्रक्रिया है, लेकिन इसे पूर्व निर्णयों को पलटने के प्रयास के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट की भूमिका स्पष्टीकरण देने और संविधान की मर्यादा बनाए रखने की है। UPSC अभ्यर्थियों को ऐसे संवैधानिक घटनाक्रमों पर गहन समझ रखनी चाहिए, क्योंकि यही लोकतांत्रिक मूल्यों और प्रशासनिक विवेक की पहचान है।
📌 ऐसे ही संवैधानिक और सामयिक विश्लेषण के लिए जुड़े रहें — Suryavanshi IAS के साथ।
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