Tuesday, August 5, 2025

"सिर्फ साँस लो... और फिर नौकरी छोड़ दो?"

 

"सिर्फ साँस लो... और फिर नौकरी छोड़ दो?"

भारत के IT युवाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर संकट
✍️ Suryavanshi IAS


"Work hard, hustle harder."
लेकिन जब मेहनत ही स्थायित्व की गारंटी न दे पाए, तो फिर कौन-सा गोल्डन फ्यूचर?

आज भारत का IT सेक्टर उस दौर से गुजर रहा है, जहां छंटनियाँ (layoffs) आम हो गई हैं।
TCS ने हाल ही में 2% वैश्विक कार्यबल को बाहर का रास्ता दिखाया — यानी 12,000 से अधिक नौकरियाँ खत्म।
अन्य कंपनियाँ भी इसी राह पर हैं।

और इस बीच, जो सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं, वो हैं — हमारे युवा, वो भी करियर की शुरुआत में।


🔴 नौकरी नहीं, पहचान खोती है

आज एक युवा कर्मचारी के लिए नौकरी सिर्फ एक सैलरी नहीं होती —
वो होती है:

  • उसकी पहचान

  • उसके सपने

  • और पूरे परिवार की उम्मीदें

जब अचानक नौकरी चली जाती है —

  • चौंक जाना,

  • अविश्वास,

  • बेइज्जती का डर,

  • अकेलापन,

  • और अवसाद हावी हो जाता है।

NIMHANS की निदेशक डॉ. प्रतिमा मूर्ति कहती हैं:

“नौकरी जाने का असर सिर्फ उस व्यक्ति पर नहीं होता, बल्कि पूरे परिवार की आर्थिक व्यवस्था चरमरा जाती है।”


🔴 तनाव पहले से था, अब डर भी जुड़ गया है

आज एक IT कर्मचारी औसतन 10-12 घंटे काम करता है, वो भी सप्ताह के सातों दिन।

अब सोचिए — जब ऐसी मेहनत के बाद भी नौकरी की गारंटी न मिले, तो मानसिक दबाव कितना होगा?

एक कर्मचारी कहती हैं:

“हमारे यहां डिप्रेशन अब सामान्य है। किसी को नींद नहीं आती, किसी को जीने की इच्छा नहीं।”


🔴 महिलाएं दोहरी मार झेल रही हैं

महिला कर्मचारियों के लिए हालत और भी खराब है:

  • ऑफिस में पुरुषों जितना काम

  • घर में रसोई, बच्चे, बुजुर्गों की देखभाल

और जब मानसिक तनाव आता है, तो उन्हें ही कमजोर समझा जाता है।
क्या यह न्याय है?


🔴 मानसिक स्वास्थ्य पर चुप्पी क्यों?

हमारे समाज में आज भी मानसिक स्वास्थ्य पर बात करना कमजोरी मानी जाती है।

छंटनी के बाद युवा:

  • किसी को बताते नहीं

  • थेरेपी से डरते हैं

  • मदद मांगने में शर्माते हैं

यही चुप्पी, तनाव को और खतरनाक बना देती है।
और नतीजा? अकेलापन, substance abuse और कई बार आत्महत्या तक की स्थिति।


🔴 कॉरपोरेट का ‘इन्हेल-एक्सहेल’ समाधान बेकार है

कुछ कंपनियाँ मेंटल हेल्थ सेमिनार कराती हैं।
काउंसलिंग लिंक देती हैं।

लेकिन जब कर्मचारी डूब रहा हो, तो सिर्फ “साँस लो और छोड़ दो” कहना, समाधान नहीं होता।

“जड़ पर कोई काम नहीं हो रहा। बस ऊपर-ऊपर दिखावा है।” — एक IT कर्मचारी


अब बदलाव जरूरी है: नीति स्तर पर

सरकार और कंपनियों को अब समझना होगा:

🛡️ मानसिक स्वास्थ्य कोई "लक्सरी" नहीं — ये एक अधिकार है।
🛠️ मानसिक स्वास्थ्य सहायता को HR पॉलिसी का हिस्सा बनाना चाहिए
📜 लेबर लॉ में बदलाव करें ताकि छंटनी के वक्त मानसिक सहायता अनिवार्य हो
📞 छंटनी से पहले और बाद में काउंसलिंग, करियर गाइडेंस, और फैमिली सपोर्ट जरूरी है
👩‍⚖️ महिलाओं और कमजोर वर्गों के लिए विशेष प्रोटेक्शन


🧭 यदि युवा टूटेंगे, तो देश नहीं बन पाएगा

भारत की ताकत उसका युवा है।
लेकिन अगर वो ही तनाव, अवसाद और असुरक्षा से जूझ रहा है —
तो हम कैसा “डेमोग्राफिक डिविडेंड” पाएँगे?

Digital India तभी सफल होगा, जब Youth India मानसिक रूप से स्वस्थ होगा।


🔚 निष्कर्ष: अब चुप्पी नहीं, समाधान चाहिए

हर युवा से कहूँगा:

तुम सिर्फ एक एम्प्लॉयी नहीं हो। तुम परिवार की उम्मीद हो। देश की शक्ति हो।
अगर तुम्हें तकलीफ है, तो आवाज़ उठाना कमजोरी नहीं — बहादुरी है।

अब समय है:

  • कॉरपोरेट संस्कृति में इंसानियत जोड़ने का

  • छंटनी के दौरान सहानुभूति अपनाने का

  • और मानसिक स्वास्थ्य को “Wellness Day” से निकाल कर नीति में शामिल करने का

क्योंकि अगर हम सॉफ्टवेयर बना सकते हैं, तो सिस्टम भी बदल सकते हैं।


✒️ — Suryavanshi IAS
युवा-प्रशासन | नीति-परिवर्तन | भारत पहले

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