Sunday, September 7, 2025

प्रश्न: “मणिपुर में ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स’ (SoO) समझौते के विस्तार से लोकतांत्रिक वैधता और संघीय सिद्धांतों पर प्रश्न उठते हैं।” आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।

 

प्रश्न: “मणिपुर में ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स’ (SoO) समझौते के विस्तार से लोकतांत्रिक वैधता और संघीय सिद्धांतों पर प्रश्न उठते हैं।” आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए।


प्रस्तावना

मणिपुर में केंद्र सरकार, राज्य सरकार तथा विभिन्न कुकी-ज़ो उग्रवादी गुटों के बीच हिंसा को नियंत्रित करने और वार्ता का मार्ग प्रशस्त करने हेतु सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशन्स (SoO) समझौता किया गया था। हाल ही में केंद्र ने राज्य सरकार व अनेक नागरिक संगठनों (जैसे – COCOMI) के विरोध के बावजूद इस समझौते का विस्तार कर दिया। इसने इसकी लोकतांत्रिक वैधता और संघीय ढांचे पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं।


लोकतांत्रिक वैधता से जुड़े प्रश्न

  1. सम्मति का अभाव: निर्णय केंद्र द्वारा एकतरफा लिया गया, जिसमें निर्वाचित राज्य सरकार से पर्याप्त परामर्श नहीं हुआ।

  2. नागरिक समाज का विरोध: मेइती बहुल संगठनों ने इसे जनभावनाओं के विपरीत और लोकतांत्रिक प्रक्रिया को कमजोर करने वाला माना।

  3. विश्वास की कमी: SoO के बावजूद उग्रवादी गतिविधियों की निरंतरता लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने की भावना देती है।

  4. प्रतिनिधित्व की समस्या: हथियारबंद गुटों से संवाद निर्वाचित प्रतिनिधियों की तुलना में प्राथमिकता पाता दिख रहा है।


संघीय चिंताएँ

  1. राज्य स्वायत्तता का क्षरण: कानून-व्यवस्था राज्य सूची का विषय है, फिर भी केंद्र द्वारा SoO का विस्तार राज्य की भूमिका को गौण करता है।

  2. असमान संघवाद: केंद्र का प्रभुत्व सहकारी संघवाद की भावना को चुनौती देता है।

  3. सुरक्षा बनाम स्वायत्तता: राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर केंद्रीय दखल राज्य की प्राथमिकताओं से टकराव उत्पन्न करता है।


SoO के पक्ष में तर्क

  1. शांति-निर्माण का साधन: हिंसा को रोकने और वार्ता के लिए अवसर देता है।

  2. राष्ट्रीय सुरक्षा की आवश्यकता: मणिपुर जैसे सीमा-राज्य में उग्रवाद के अंतर्राष्ट्रीय आयाम (म्यांमार से जुड़ाव) केंद्र के हस्तक्षेप को जरूरी बनाते हैं।

  3. समावेशी संघवाद: केंद्र यह तर्क देता है कि वह पूरे देश के नागरिकों का प्रतिनिधित्व करता है, न कि केवल राज्य सरकार का।


आलोचनात्मक विश्लेषण

  • SoO संघर्षग्रस्त क्षेत्रों में शासन की दुविधा दर्शाता है: शांति के लिए केंद्रीय पहल आवश्यक हो सकती है, किंतु इससे संघीय संतुलन व लोकतांत्रिक जवाबदेही कमजोर होती है।

  • अल्पकालिक स्थिरता तो संभव है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए सभी समुदायों को संवाद में शामिल करना और राज्य सरकार को निर्णायक भूमिका देना आवश्यक है।

  • पारदर्शिता और संवाद का अभाव सामाजिक अविश्वास को और बढ़ा सकता है।


निष्कर्ष

मणिपुर में SoO का विस्तार शांति बनाम प्रक्रिया के द्वंद्व को सामने लाता है। यद्यपि यह समझौता तात्कालिक स्थिरता ला सकता है, किंतु राज्य सरकार और नागरिक समाज से पर्याप्त परामर्श न होने के कारण इसकी लोकतांत्रिक वैधता संदिग्ध है। स्थायी शांति हेतु आवश्यक है कि केंद्र एक संघीय, पारदर्शी और सहभागी दृष्टिकोण अपनाए, जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित हो सके।

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