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16वां वित्त आयोग (16th Finance Commission) और वित्तीय संघवाद
1. परिचय (Introduction)
वित्त आयोग (FC): भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 (Article 280) के तहत गठित एक संवैधानिक संस्था।
मुख्य कार्य: केंद्र और राज्यों के बीच करों का बंटवारा (Vertical Devolution) और राज्यों के आपस में फंड का वितरण (Horizontal Devolution) तय करना ताकि राजकोषीय असंतुलन (Fiscal Imbalances) को दूर किया जा सके।
2. ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण (Vertical Devolution)
राज्यों की हिस्सेदारी: 16वें वित्त आयोग ने इसे 41% पर बरकरार रखा (15वें FC के समान)। राज्यों की 50% की मांग को खारिज किया गया।
सेस और सरचार्ज (Cess & Surcharge) का मुद्दा: यह कुल केंद्रीय कर राजस्व का 15% से अधिक हो चुका है। यह 'विभाज्य पूल' (Divisible Pool) का हिस्सा नहीं होता, जिससे राज्यों का वास्तविक राजस्व हिस्सा घट जाता है।
स्वायत्तता पर दबाव (Constraints on States):
रेवेन्यू डेफिसिट ग्रांट (Revenue-Deficit Grants) और सेक्टर-विशिष्ट अनुदान समाप्त।
बजट से बाहर के कर्ज (Off-budget borrowings) को मुख्य बजट में शामिल करने का निर्देश।
राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को 3% से नीचे रखने की सख्त शर्त।
3. क्षैतिज हस्तांतरण: 16वें वित्त आयोग के मानदंड (Horizontal Devolution Criteria)
16वें FC ने समानता बनाम दक्षता (Equity vs Efficiency) के अनुपात को 75:25 से बदलकर 70:30 किया है।
| मानदंड (Criteria) | वजन (Weight) | मुख्य बिंदु / परिवर्तन |
| आय की दूरी (Income Distance) | 42.5% | सबसे बड़ा मानदंड (गरीब राज्यों के पक्ष में)। |
| जनसंख्या (Population) | 17.5% | 2011 की जनगणना के आधार पर। |
| क्षेत्रफल (Area) | 10.0% | भौगोलिक आकार के लिए। |
| वन क्षेत्र (Forest Cover) | 10.0% | पर्यावरण संरक्षण के लिए। |
| जनसांख्यिकीय प्रदर्शन (Demographic) | 10.0% | प्रजनन दर की जगह जनसंख्या वृद्धि (Population Growth) को आधार बनाया। |
| राष्ट्रीय GDP में योगदान (GSDP Contribution) | 10.0% | "टैक्स एफर्ट" की जगह नया मानदंड। |
4. मुख्य विवाद: वर्गमूल रूपांतरण (The Square-Root Transformation)
मुद्दा: आर्थिक रूप से मजबूत राज्यों को बढ़ावा देने के लिए जीडीपी (GSDP) योगदान को शामिल तो किया गया, लेकिन उस पर स्क्वायर-रूट (वर्गमूल) लगा दिया गया।
प्रभाव: इसने अमीर और बड़े राज्यों के वास्तविक आर्थिक भार को बहुत कम कर दिया:
महाराष्ट्र: 14.23% (वास्तविक) $\rightarrow$ 8.31% (फॉर्मूले के बाद)
तमिलनाडु: 9.09% (वास्तविक) $\rightarrow$ 6.67% (फॉर्मूले के बाद)
कर्नाटक: 8.95% (वास्तविक) $\rightarrow$ 6.59% (फॉर्मूले के बाद)
नुकसान: यदि वास्तविक GSDP (बिना वर्गमूल के) का उपयोग किया जाता, तो इन राज्यों को पूरे कार्यकाल में ₹1.6 लाख करोड़ से ₹2.5 लाख करोड़ तक का अतिरिक्त राजस्व मिलता।
5. क्षेत्रीय असंतुलन और सार्वजनिक सेवाओं की विफलता
क्षेत्रीय अंतर: हस्तांतरण के बाद भी 4 बड़े राज्यों (UP, बिहार, MP, पश्चिम बंगाल) को करीब 50% फंड मिलता है, जबकि 4 दक्षिणी राज्यों (आंध्र, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु) का हिस्सा केवल 17% के आसपास है।
राजकोषीय दक्षता की कमी: बिना किसी शर्त के मिलने वाले इस फंड से गरीब राज्यों में बुनियादी सेवाओं का विकास नहीं हो पाया है।
उदाहरण (स्वास्थ्य पर प्रति व्यक्ति खर्च): बिहार (₹937) बनाम अरुणाचल प्रदेश (₹10,148)।
6. भविष्य की चुनौतियाँ और वे फॉरवर्ड (Way Forward)
परिसीमन का खतरा (Delimitation Risk): भारत में राजनीतिक रूप से शक्तिशाली राज्य (अधिक लोकसभा सीटों वाले) अक्सर आर्थिक रूप से कमजोर हैं। आगामी परिसीमन के बाद यह राजनीतिक-आर्थिक असंतुलन और बढ़ सकता है।
सुझाव (Suggestions for Future FCs):
गैर-वित्तीय संकेतकों (जैसे जनसंख्या) पर अत्यधिक निर्भरता कम की जाए।
राज्यों की वास्तविक राजकोषीय क्षमता (Fiscal Capacity) और वित्तीय परिणामों (Fiscal Outcomes) को अधिक वेटेज दिया जाए।
डेटा-संचालित और वैज्ञानिक पद्धतियों जैसे प्रिंसिपल कंपोनेंट एनालिसिस (PCA) का उपयोग करके मानदंड और उनके वजन तय किए जाएं।
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