Wednesday, June 10, 2026

सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs): भारतीय ऋण बाज़ार का आधार

 

सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs): भारतीय ऋण बाज़ार का आधार

1. संरचनात्मक वर्गीकरण (Structural Classification)

भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) और भारत सरकार के नियमों के अनुसार, सरकारी प्रतिभूतियों को मुख्य रूप से उनकी अवधि (Tenure) और जारीकर्ता (Issuer) के आधार पर विभाजित किया जाता है:

                                  ┌───────────────────────────┐
                                  │ सरकारी प्रतिभूतियाँ (G-Secs)   │
                                  └─────────────┬─────────────┘
                                                │
                 ┌──────────────────────────────┴──────────────────────────────┐
                 ▼                                                             ▼
┌─────────────────────────────────┐                           ┌─────────────────────────────────┐
│     केन्द्र सरकार (Central Govt)    │                           │    राज्य सरकार (State Govts)    │
├─────────────────────────────────┤                           ├─────────────────────────────────┤
│ • अल्पकालिक (Short-term) और    │                           │ • केवल दीर्घकालिक (Long-term)    │
│   दीर्घकालिक दोनों जारी करती है।      │                           │   बॉन्ड्स जारी कर सकती हैं।      │
└─────────────────────────────────┘                           └─────────────────────────────────┘
                 │                                                             │
     ┌───────────┴───────────┐                                                 ▼
     ▼                       ▼                                    ┌─────────────────────────┐
┌──────────────┐       ┌──────────────┐                           │ राज्य विकास ऋण (SDLs)  │
│  अल्पकालिक   │       │  दीर्घकालिक    │                           └─────────────────────────┘
└──────┬───────┘       └──────┬───────┘
       │                      │
       ├────────────────┐     └──────────────────────┐
       ▼                ▼                            ▼
┌──────────────┐ ┌──────────────┐             ┌──────────────┐
│  CMBs (<91D) │ │T-Bills (91D, │             │  Dated G-Sec │
│              │ │182D, 364D)   │             │ (5 to 40 Yrs)│
└──────────────┘ └──────────────┘             └──────────────┘

2. प्रमुख वित्तीय उपकरण और उनकी विशेषताएँ

A. कैश मैनेजमेंट बिल (CMBs)

  • परिचय: इसे वर्ष 2010 में RBI द्वारा पेश किया गया था।

  • उद्देश्य: सरकार के दैनिक या अस्थायी नकदी प्रवाह में आने वाले बेमेल (Temporary Cash Flow Mismatches) को ठीक करना।

  • अवधि: इनकी परिपक्वता अवधि (Maturity) 91 दिनों से कम होती है।

B. ट्रेजरी बिल (T-Bills)

  • अवधि: ये केवल तीन निश्चित अवधियों के लिए जारी किए जाते हैं — 91 दिन, 182 दिन, और 364 दिन

  • शून्य कूपन संरचना (Zero-Coupon Structure): इन पर कोई ब्याज (Interest) नहीं दिया जाता। इसके बजाय, इन्हें 'डिस्काउंट' पर जारी किया जाता है और परिपक्वता पर अंकित मूल्य (Face Value) लौटाया जाता है।

    • उदाहरण: ₹100 का टी-बिल यदि ₹98.20 में बेचा गया, तो परिपक्वता पर निवेशक को ₹100 मिलेंगे। यहाँ ₹1.80 निवेशक का शुद्ध लाभ (Return) है।

C. दिनांकित प्रतिभूतियाँ (Dated Securities)

  • अवधि: ये दीर्घकालिक निवेश उपकरण हैं, जिनकी अवधि 5 वर्ष से 40 वर्ष तक होती है। इन पर निश्चित या फ्लोटिंग ब्याज दर (Coupon Rate) दी जाती है।

3. U.P.S.C. प्रीलिम्स हेतु विशेष ध्यान देने योग्य बिंदु (Key Technicalities)

  • गिल्ट-एज्ड प्रतिभूतियाँ (Gilt-Edged Instruments): चूँकि ये सरकार द्वारा समर्थित होती हैं, इसलिए इनमें डिफ़ॉल्ट (पैसा डूबने) का जोखिम शून्य होता है। इसी कारण इन्हें वित्तीय बाज़ार में 'जोखिम-मुक्त या गिल्ट-एज्ड' कहा जाता है।

  • राज्य सरकारों का अधिकार क्षेत्र: सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि राज्य सरकारें ट्रेजरी बिल (T-Bills) या CMBs जारी नहीं कर सकतीं। वे धन जुटाने के लिए केवल दीर्घकालिक बॉन्ड्स जारी करती हैं, जिन्हें राज्य विकास ऋण (State Development Loans - SDLs) कहा जाता है।

  • रिटेल डायरेक्ट स्कीम (Retail Direct Scheme): हाल के वर्षों में RBI ने आम नागरिकों (Retail Investors) को भी सीधे इन प्रतिभूतियों में निवेश करने की अनुमति दी है, जिससे भारत का ऋण बाज़ार अधिक समावेशी हुआ है।

Mains Value-Addition: सरकारी प्रतिभूतियाँ न केवल सरकार के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) को पूरा करने का माध्यम हैं, बल्कि ये रिज़र्व बैंक की मौद्रिक नीति (Monetary Policy) के संचालन, जैसे— ओपन मार्केट ऑपरेशन्स (OMO), के लिए भी एक प्राथमिक हथियार के रूप में कार्य करती हैं।

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