Wednesday, August 26, 2026

उच्च न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत सुधार (कॉलेजियम प्रणाली)

 

उच्च न्यायपालिका में पारदर्शिता, जवाबदेही और संस्थागत सुधार (कॉलेजियम प्रणाली)

पाठ्यक्रम मैपिंग (Syllabus Mapping):

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र II: भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं एवं बुनियादी संरचना; कार्यपालिका और न्यायपालिका की संरचना, संगठन और कार्यप्रणाली; विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति, शक्तियां, कार्य और उत्तरदायित्व; विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण, विवाद निवारण तंत्र तथा संस्थान।

  • सामान्य अध्ययन प्रश्नपत्र IV: लोक सेवा मूल्य तथा नैतिकता (संस्थागत सत्यनिष्ठा, भाई-भतीजावाद बनाम योग्यता, सार्वजनिक निर्णय प्रक्रिया में पारदर्शिता)।

1. प्रमुख संवैधानिक एवं विधिक प्रावधान

अनुच्छेद / कानूनसंवैधानिक दायरा एवं न्यायिक व्याख्या
अनुच्छेद 124(2)यह निर्धारित करता है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से "परामर्श" (Consultation) के बाद की जाएगी, जिन्हें राष्ट्रपति आवश्यक समझें।
अनुच्छेद 217(1)भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), राज्य के राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के साथ परामर्श के बाद राष्ट्रपति द्वारा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति का प्रावधान करता है।
अनुच्छेद 14 एवं 16विधि के समक्ष समानता और सार्वजनिक नियुक्तियों में अवसर की समानता की गारंटी; मनमानेपन पर रोक और पारदर्शी प्रक्रिया की अनिवार्यता (कर्नाटक राज्य बनाम उमादेवी, 2006)।
अनुच्छेद 19(1)(a) एवं RTI अधिनियम, 2005नागरिकों के जानने के अधिकार (Right to Know) को सुनिश्चित करता है। CPIO, सुप्रीम कोर्ट बनाम सुभाष चंद्र अग्रवाल (2019) मामले में संविधान पीठ ने माना कि CJI का कार्यालय RTI के तहत 'सार्वजनिक प्राधिकरण' है, जिसमें न्यायिक स्वतंत्रता और पारदर्शिता के बीच संतुलन आवश्यक है।
99वां संविधान संशोधन (2014)राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) की स्थापना का प्रयास; 2015 में चौथे जजेस केस में 4:1 के बहुमत से इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता (मूल संरचना) का उल्लंघन मानकर असंवैधानिक घोषित किया गया।

2. नियुक्ति प्रणाली का विकास: 'जजेस केसेज' (Judges Cases)

1981: प्रथम जजेस केस (SP गुप्ता) ──────► कार्यपालिका की प्रधानता ("परामर्श" का अर्थ "सहमति" नहीं)
1993: द्वितीय जजेस केस (SCAORA) ─────► न्यायपालिका की प्रधानता (CJI + 2 वरिष्ठतम न्यायाधीश)
1998: तृतीय जजेस केस (अनु. 143 संदर्भ) ──► विस्तृत कॉलेजियम (SC हेतु CJI + 4; HC हेतु CJI + 2)
2015: चतुर्थ जजेस केस (NJAC रद्द) ───► कॉलेजियम व्यवस्था बहाल; MoP सुधार का निर्देश
2024–2026: पारदर्शिता का संकट ────────► सकारण प्रस्तावों (Reasoned Resolutions) के प्रकाशन पर रोक

3. संस्थागत आलोचनाएं एवं संरचनात्मक चुनौतियां

कॉलेजियम की वैधता से जुड़ी चुनौतियां
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▼ ▼ ▼
प्रक्रियात्मक अपारदर्शिता योग्यता बनाम पारिवारिक संबंध न्यायशास्त्रीय दोहरापन
• रिक्तियों की कोई पूर्व सूचना नहीं • 'अंकल जजेस' परिघटना • कार्यपालिका से पारदर्शिता
• पात्रता का कोई मानक नहीं • प्रथम पीढ़ी के वकीलों की की मांग (*उमादेवी*), पर
• निर्णयों के कारणों का अभाव तुलना में वंशानुगत प्रभाव स्वयं बंद दरवाजों में चयन
  • प्रक्रियात्मक अपारदर्शिता: अन्य सार्वजनिक चयनों के विपरीत, कॉलेजियम प्रणाली में न तो कोई सार्वजनिक पात्रता मैट्रिक्स है, न ही संरचित साक्षात्कार या न्यायिक क्षमता के मूल्यांकन का कोई खुला पैमाना।

  • 'अंकल जज' परिघटना (Uncle Judges Syndrome): पूर्व और वर्तमान न्यायाधीशों के परिजनों/रिश्तेदारों को पदोन्नति में अनुचित प्राथमिकता मिलने के आरोप (पूर्व CJI आर.एम. लोढ़ा और केंद्रीय विधि मंत्रालय की टिप्पणियों द्वारा भी रेखांकित), जिससे प्रथम पीढ़ी (First-generation) के योग्य वकीलों के लिए समान अवसर बाधित होते हैं।

  • न्यायशास्त्रीय विषमता (Jurisprudential Asymmetry): उच्चतम न्यायालय ने मीडियावन मामले (2023) में सीलबंद लिफाफे की गोपनीयता (Sealed-cover secrecy) को पारदर्शिता के सिद्धांतों के विरुद्ध बताया और उमादेवी केस (2006) में सार्वजनिक नियुक्तियों में खुली प्रक्रिया अनिवार्य की, किंतु अपनी स्वयं की नियुक्तियों में इन मानकों का अभाव बनाए रखा है।

  • वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाएं:

    • यूनाइटेड किंगडम (UK): स्वतंत्र न्यायिक नियुक्ति आयोग (JAC) रिक्तियों का सार्वजनिक विज्ञापन जारी करता है और संरचित योग्यता-आधारित साक्षात्कार आयोजित करता है।

    • दक्षिण अफ्रीका: न्यायिक सेवा आयोग (JSC) सार्वजनिक रूप से नामांकन आमंत्रित करता है और खुली, टेलीविज़न पर प्रसारित साक्षात्कार प्रक्रिया अपनाता है।

4. सुधार का खाका: "पीछे हटने के बजाय सुधार" (Reform, Not Retreat)

  • प्रक्रिया ज्ञापन (Memorandum of Procedure - MoP) का संस्थागतीकरण: 2015 के NJAC निर्णय के निर्देशों के अनुरूप पात्रता, खोज एवं मूल्यांकन समितियों और सचिवालयी सहायता को शामिल करते हुए संशोधित MoP को अंतिम रूप देना।

  • खोज एवं मूल्यांकन समितियां (Search & Evaluation Committees): प्रतिष्ठित न्यायविदों और विशेषज्ञों की एक स्थायी स्क्रीनिंग समिति बनाई जाए, जो निर्णयों की गुणवत्ता, वकालत के अनुभव और सत्यनिष्ठा के आधार पर उम्मीदवारों की प्रारंभिक सूची तैयार करे।

  • कारण सहित निर्णयों का प्रकाशन: संभावित रिक्तियों को पूर्व में अधिसूचित किया जाए और किसी उम्मीदवार के चयन के कारणों का संक्षिप्त, वस्तुनिष्ठ रिकॉर्ड सार्वजनिक किया जाए, जिससे व्यक्तिगत गोपनीयता का उल्लंघन किए बिना प्रक्रिया में खुलापन आए।

5. विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)

प्रारंभिक परीक्षा (Prelims)

प्र.1. (CSE Prelims 2019)

भारत के संविधान के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. किसी भी उच्च न्यायालय के पास किसी केंद्रीय कानून को संवैधानिक रूप से अमान्य घोषित करने का अधिकार क्षेत्र नहीं होगा।

  2. भारत के संविधान में किए गए किसी संशोधन पर भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रश्न नहीं उठाया जा सकता।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

सही उत्तर: (d) न तो 1 और न ही 2

प्र.2. (CSE Prelims 2017)

निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत में न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) का तात्पर्य कार्यपालिका के आदेशों और विधायिका के कानूनों की संवैधानिकता पर निर्णय लेने की न्यायपालिका की शक्ति से है।

  2. भारत का संविधान 'मूल संरचना' (Basic Structure) शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है।

उपर्युक्त कथनों में से कौन-सा/से सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

सही उत्तर: (a) केवल 1

मुख्य परीक्षा (Mains)

  • CSE Mains 2019 (GS Paper II):

    "‘उच्च न्यायपालिका की न्यायिक स्वतंत्रता लोकतंत्र के लिए एक अनिवार्य आवश्यकता है, किंतु इसे जवाबदेही से अछूता नहीं रखा जा सकता।’ इस कथन के आलोक में कॉलेजियम प्रणाली की कार्यप्रणाली का परीक्षण कीजिए।" (15 अंक, 250 शब्द)

  • CSE Mains 2017 (GS Paper II):

    "भारत में उच्च न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम (NJAC), 2014 पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय का समालोचनात्मक परीक्षण कीजिए।" (10 अंक, 150 शब्द)

  • CSE Mains 2015 (GS Paper II):

    "न्यायपालिका द्वारा 'न्यायिक सक्रियता' का सहारा लेना अक्सर विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में अतिक्रमण के रूप में देखा जाता है। इस संदर्भ में राज्य के अंगों के बीच शक्ति संतुलन का मूल्यांकन कीजिए।" (12.5 अंक, 200 शब्द)

6. मुख्य परीक्षा अभ्यास प्रश्न

प्रश्न: "न्यायिक स्वतंत्रता की परिकल्पना न्यायालयों को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से बचाने के लिए की गई थी, न कि नियुक्ति प्रक्रिया को संवैधानिक जवाबदेही और प्रक्रियात्मक पारदर्शिता से अलग रखने के लिए। भारत में कॉलेजियम प्रणाली की कार्यप्रणाली का समालोचनात्मक विश्लेषण कीजिए तथा न्यायिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वास के बीच संतुलन स्थापित करने हेतु संरचनात्मक सुधारों का सुझाव दीजिए। (15 अंक, 250 शब्द)"

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