1907 का 'बर्लिन कमेटी फ्लैग' (स्टटगार्ट ध्वज) भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रतीकात्मक इतिहास का एक मील का पत्थर है। इसे विदेशी धरती पर भारत की स्वतंत्रता का प्रतिनिधित्व करने वाला पहला अनौपचारिक राष्ट्रीय ध्वज माना जाता है।
ध्वज निर्माण की पृष्ठभूमि
पेरिस में मुलाकात: 1906–1907 के दौरान जब हेमचंद्र कानूनगो बम निर्माण और सैन्य तकनीक सीखने पेरिस पहुंचे, तब उनका संपर्क भारतीय राष्ट्रवादियों की विदेशी शाखा से हुआ। वहाँ वे मैडम भीकाजी कामा, श्यामजी कृष्ण वर्मा और सरदार सिंह राणा के साथ जुड़े।
साझा परिकल्पना: हेमचंद्र कानूनगो केवल एक कुशल रसायनज्ञ और क्रांतिकारी ही नहीं थे, बल्कि वे कलकत्ता गवर्नमेंट कॉलेज ऑफ आर्ट्स से प्रशिक्षित एक प्रतिभाशाली चित्रकार (आर्टिस्ट) भी थे। आगामी अंतर्राष्ट्रीय मंच पर भारत का पक्ष रखने के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्रीय प्रतीक की आवश्यकता महसूस की गई, जिसके बाद मैडम कामा और सरदार सिंह राणा के वैचारिक इनपुट के साथ हेमचंद्र ने इस ध्वज का डिजाइन तैयार किया।
ध्वज की बनावट और प्रतीक
यह ध्वज तीन क्षैतिज पट्टियों (Tricolor) वाला था, जिसमें हरे, पीले और लाल रंगों का प्रयोग किया गया था:
| पट्टी का रंग | अंकित प्रतीक | प्रतीकात्मक अर्थ |
| शीर्ष पट्टी (हरा रंग) | आठ आधे खिले कमल के फूल (Lotus) | ब्रिटिश भारत के तत्कालीन आठ प्रमुख प्रांतों का प्रतिनिधित्व। |
| मध्य पट्टी (पीला रंग) | देवनागरी लिपि में "वन्दे मातरम्" | उस समय के राष्ट्रवाद और बंग-भंग विरोधी आंदोलन का सबसे बड़ा मंत्र। |
| निचली पट्टी (लाल रंग) | बाएँ सूर्य और दाएँ अर्धचंद्र (Sun & Crescent) | देश के दो प्रमुख धार्मिक समुदायों—हिंदू (सूर्य) और मुस्लिम (चंद्रमा)—की एकता और अखंडता का प्रतीक। |
स्टटगार्ट सम्मेलन (22 अगस्त 1907)
जर्मनी के स्टटगार्ट में आयोजित 'द्वितीय अंतर्राष्ट्रीय समाजवादी कांग्रेस' (Second International Socialist Congress) में मैडम भीकाजी कामा ने इस ध्वज को अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधियों के सामने फहराया।
ब्रिटिश प्रतिनिधियों के कड़े विरोध के बावजूद, मैडम कामा ने मंच पर ध्वज लहराते हुए आह्वान किया:
"यह स्वतंत्र भारत का ध्वज है। मैं सभी स्वतंत्रता प्रेमियों से अपील करती हूँ कि वे इस ध्वज के सम्मान में खड़े हों।"
ऐतिहासिक निरंतरता
यह ध्वज आगे चलकर 1917 के 'होम रूल लीग ध्वज' और 1921 में पिंगली वेंकैया द्वारा गांधीजी को प्रस्तुत किए गए 'स्वराज ध्वज' के विकास का आधार बना, जो अंततः 1947 के वर्तमान भारतीय तिरंगे के रूप में विकसित हुआ।
स्टटगार्ट में फहराया गया यह मूल ध्वज बाद में भारत लाया गया और वर्तमान में पुणे स्थित मराठा और केसरी ट्रस्ट (केसरी वाड़ा) के पुस्तकालय में सुरक्षित रखा गया है।
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