Wednesday, August 27, 2025

राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति, न्यायिक समीक्षा और अनुच्छेद 200: यूपीएससी के लिए एक संवैधानिक पहेली

 राज्यपाल की विवेकाधीन शक्ति, न्यायिक समीक्षा और अनुच्छेद 200: यूपीएससी के लिए एक संवैधानिक पहेली

परिचय

सर्वोच्च न्यायालय में, मुख्य न्यायाधीश भारत बी.आर. गवई की अगुवाई में हाल की एक सुनवाई ने एक गंभीर संवैधानिक मुद्दे को केंद्र में ला दिया है—जो यूपीएससी परीक्षा के लिए अत्यंत प्रासंगिक है। मूल प्रश्न यह है: यदि न्यायपालिका अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) के तहत राज्यपाल की कार्रवाई की समीक्षा कर सकती है, तो वह अनुच्छेद 200 के तहत राज्य विधेयकों पर कार्रवाई न करने की उनकी निष्क्रियता की जांच क्यों नहीं कर सकती?

यह ब्लॉग इस मुद्दे का विश्लेषण करेगा, इसे यूपीएससी पाठ्यक्रम से जोड़ेगा, संबंधित संवैधानिक अनुच्छेदों की जांच करेगा और आपकी समग्र समझ बनाने में मदद के लिए महत्वपूर्ण पिछले वर्षों के प्रश्नों (PYQs) की समीक्षा करेगा।


विवाद का केंद्र: सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

राष्ट्रपतीय संदर्भ (Presidential Reference - अनुच्छेद 143 के तहत एक प्रक्रिया जहाँ राष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट की राय मांगते हैं) की सुनवाई के दौरान, CJI की अगुवाई वाली पीठ ने केंद्र और महाराष्ट्र जैसे भाजपा शासित राज्यों से एक स्पष्ट सवाल पूछा।

  • ट्रिगर: यह संदर्भ तमिलनाडु बनाम राज्यपाल मामले में 8 अप्रैल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से उत्पन्न हुआ, जहाँ राज्यपाल वर्ष 2020 से ही विधेयकों को लंबित किए हुए थे। कोर्ट ने तब राज्य विधेयकों पर निर्णय लेने के लिए राज्यपालों और राष्ट्रपति के लिए तीन महीने की समयसीमा निर्धारित की थी।

  • राज्यों का तर्क: वरिष्ठ अधिवक्ताओं द्वारा प्रतिनिधित्व किए गए महाराष्ट्र जैसे राज्यों ने तर्क दिया कि किसी विधेयक को स्वीकृति देना "विधायी प्रक्रिया का अंतिम चरण" है और राज्यपाल की "व्यापक विवेकाधीन शक्तियों" के दायरे में आता है। उनका कहना था कि राज्यपाल के किसी भी दुर्व्यवहार को संसद द्वारा संबोधित किया जाना चाहिए, न कि न्यायपालिका द्वारा।

  • न्यायपालिका का जवाब: CJI गवई ने तार्किक रूप से इसका जवाब देते हुए एस.आर. बोम्मई मामले (1994) का हवाला दिया, जहाँ यह स्थापित किया गया था कि अनुच्छेद 356 के तहत राज्यपाल का विवेक दुर्भावना (mala fide) की जांच के लिए न्यायिक समीक्षा के अधीन है। अदालत ने सवाल किया कि जवाबदेही का यही सिद्धांत अनुच्छेद 200 के तहत राज्यपाल के कर्तव्य पर क्यों नहीं लागू होना चाहिए।


एक नजर में संवैधानिक प्रावधान

बहस को समझने के लिए, इन दोनों अनुच्छेदों पर स्पष्टता आवश्यक है:

  1. अनुच्छेद 200: विधेयकों पर स्वीकृति

    • जब राज्य विधायिका द्वारा पारित कोई विधेयक राज्यपाल के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, तो वह:

      • स्वीकृति दे सकता है।

      • स्वीकृति रोक सकता है (Withhold assent)।

      • विधेयक को राष्ट्रपति के विचार के लिए आरक्षित कर सकता है (कुछ मामलों में अनिवार्य)।

      • विधेयक (यदि यह धन विधेयक नहीं है) को पुनर्विचार के संदेश के साथ लौटा सकता है।

    • धूसर क्षेत्र (Grey Area): संविधान राज्यपाल के लिए इनमें से कोई भी कार्रवाई करने की कोई समय सीमा निर्दिष्ट नहीं करता है, जिससे वर्तमान गतिरोध उत्पन्न हुआ है।

  2. अनुच्छेद 356: राष्ट्रपति शासन

    • यदि राष्ट्रपति, राज्यपाल की रिपोर्ट पर या अन्यथा, संतुष्ट है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जहाँ राज्य सरकार संविधान के अनुसार कार्य नहीं कर सकती है, तो वह राष्ट्रपति शासन लागू कर सकता/सकती है।

    • मिसाल (एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ, 1994): सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अनुच्छेद 356 के तहत की गई उद्घोषणा न्यायोचित (justiciable) है। अदालत यह समीक्षा कर सकती है कि क्या यह दुर्भावना, अप्रासंगिक या बेतुके आधारों पर आधारित थी। इस मामले ने इस शक्ति के मनमाने उपयोग को कम कर दिया।

तार्किक दुविधा: सुप्रीम कोर्ट का तर्क है कि यदि निर्वाचित सरकार को बर्खास्त करने की उच्च-दांव वाली शक्ति (अनु. 356) की समीक्षा की जा सकती है, तो विधेयकों पर स्वीकृति देने के सरल, नियमित प्रशासनिक कार्य (अनु. 200) की निश्चित रूप से समीक्षा की जा सकती है।


यूपीएससी पाठ्यक्रम से कनेक्शन

यह मुद्दा यूपीएससी पाठ्यक्रम के कई खंडों को छूता है:

  • जीएस पेपर II:

    • भारतीय संविधान—ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान।

    • केंद्र और राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व।

    • विभिन्न अंगों के बीच शक्तियों का पृथक्करण।

    • विवाद निवारण तंत्र और संस्थान।

    • अन्य देशों के साथ भारतीय संवैधानिक योजना की तुलना।

  • जीएस पेपर II: शासन (Governance)

    • संवैधानिक निकायों (राज्यपाल) की भूमिका।

    • शासन के महत्वपूर्ण पहलू।

  • निबंध: संघवाद, लोकतंत्र, न्यायिक सक्रियता और केंद्र-राज्य संबंधों से संबंधित विषय।

  • वैकल्पिक विषय: विशेष रूप से राजनीति विज्ञान एवं अंतर्राष्ट्रीय संबंध और कानून के लिए।


पिछले वर्षों के प्रश्न (PYQs) पिछले 8 वर्षों में

इस विषय पर लगातार पूछा जाता रहा है। यहां कुछ प्रासंगिक प्रश्न दिए गए हैं:

  1. 2023: "भारत का सुप्रीम कोर्ट संविधान में संशोधन की संसद की मनमानी शक्ति पर अंकुश रखता है।" समालोचनात्मक चर्चा करें। (जबकि संशोधन शक्ति पर है, यह न्यायिक समीक्षा बनाम अन्य अंगों के विषय का परीक्षण करता है)

  2. 2022: "राज्यपाल द्वारा विधायी शक्तियों के प्रयोग के लिए आवश्यक शर्तों पर चर्चा करें। विधानमंडल के समक्ष रखे बिना राज्यपाल द्वारा अध्यादेशों को दोबारा लागू करने की वैधता पर चर्चा करें।" (राज्यपाल की विधायी भूमिका पर सीधे)

  3. 2021: "किसी आयोग के संवैधानिकरण के लिए क哪些 steps are required for constitutionalization of a Commission? क्या आपको लगता है कि राष्ट्रीय महिला आयोग को संवैधानिक दर्जा देना भारत में अधिक से अधिक लैंगिक न्याय और सशक्तिकरण सुनिश्चित करेगा? कारण दें।" (संवैधानिक निकायों बनाम कार्यकारी निकायों की समझ का परीक्षण)

  4. 2020: "न्यायिक विधान (Judicial Legislation) भारतीय संविधान में परिकल्पित शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत के विपरीत है। इस संदर्भ में कार्यपालिका अधिकारियों को दिशा-निर्देश जारी करने की प्रार्थना करने वाली बड़ी संख्या में जनहित याचिकाओं (PILs) की दाखिल को उचित ठहराएं।" (न्यायपालिका बनाम कार्यपालिका पर सीधे)

  5. 2018: "क्या सुप्रीम कोर्ट का फैसला (जुलाई 2018) दिल्ली के उप-राज्यपाल और निर्वाचित सरकार के बीच राजनीतिक खींचतान को सुलझा सकता है?" (एक नामित प्रमुख बनाम निर्वाचित सरकार की शक्तियों पर सीधा केस स्टडी)

  6. 2017: "राज्यपाल की भूमिका अhung assemblies में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। जांच करें।" (राज्यपाल के विवेक से संबंधित)

  7. 2016: "69वें संवैधानिक संशोधन अधिनियम के essentials और दिल्ली प्रशासन पर इसके प्रभाव पर चर्चा करें। साथ ही, निर्वाचित सरकार और उप-राज्यपाल के बीच हाल के विवादों पर प्रकाश डालें।" (एक और केंद्र-राज्य संबंध प्रश्न)


मुख्य परीक्षा (Mains) उत्तर लेखन के लिए महत्वपूर्ण शब्द और अवधारणाएं

  • शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत (Doctrine of Separation of Powers)

  • नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances)

  • न्यायिक समीक्षा और न्यायिक सक्रियता

  • संवैधानिक नैतिकता बनाम संवैधानिक शिष्टाचार

  • सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism)

  • राज्यपाल की भूमिका: संवैधानिक प्रमुख बनाम केंद्र के एजेंट

  • एस.आर. बोम्मई निर्णय (1994)

  • नबाम रेबिया निर्णय (2016) (सदन बुलाने की राज्यपाल की शक्ति पर)

  • राष्ट्रपतीय संदर्भ (अनुच्छेद 143)


आगे का रास्ता और निष्कर्ष

सुप्रीम कोर्ट का रुख एक संवैधानिक निर्वात को भरने की दिशा में एक कदम दर्शाता है। एक राज्यपाल, जो राष्ट्रपति का एक गैर-निर्वाचित प्रतिनिधि है, द्वारा विधेयकों को अनिश्चित काल तक लंबित रखना उत्तरदायी सरकार और राज्य विधायिका में सन्निहित लोकप्रिय इच्छा की जड़ पर प्रहार करता है।

एक संभावित समाधान एक संवैधानिक संशोधन हो सकता है जो राज्यपालों के लिए विधेयकों पर कार्रवाई करने के लिए एक उचित समय सीमा निर्धारित करता है, ठीक कृष्ण कुमार सिंह मामले (2017) में अध्यादेशों के पुन: प्रख्यापन पर राष्ट्रपति द्वारा निर्णय लेने की 15-दिन की सीमा की तरह।

यूपीएससी उम्मीदवारों के लिए, यह चल रहा टकराव एक लाइव केस स्टडी है:

  • भारतीय संविधान की विकसित होती प्रकृति का।

  • केंद्र और राज्यों के बीच की गतिशीलता का।

  • संविधान के संरक्षक के रूप में न्यायपालिका की सक्रिय भूमिका का।

ऐसी करंट अफेयर्स को संवैधानिक दृष्टिकोण के माध्यम से विश्लेषण करते रहें। यह सिर्फ खबर के बारे में नहीं है; यह दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की Functioning को समझने के बारे में है।

सूचित रहें, आगे रहें!

- टीम सूर्यवंशी आईएएस

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