क़यामत की भविष्यवाणियाँ, कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और भारत में घटती उग्रवादिता
लेखक: सूर्यवंशी IAS
प्रस्तावना
इतिहास गवाह है कि भविष्यवाणी करना हमेशा एक जोखिम भरा कार्य रहा है। नेता, रणनीतिकार और विद्वान कई बार अपनी ही भविष्यवाणियों से गलत साबित हुए हैं। आज के दौर में, जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) तेज़ी से सुरक्षा परिदृश्य को बदल रही है, तो आतंकवाद और सुरक्षा से जुड़ी भविष्यवाणियाँ और भी खतरनाक हो गई हैं।
विश्व स्तर पर आतंकवाद नए-नए रूपों में उभरता रहा है, जबकि भारत इसके विपरीत—विशेषकर नक्सलवाद जैसे वैचारिक उग्रवाद—के घटते ग्राफ का अनुभव कर रहा है। UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह अंतर समझना बेहद आवश्यक है।
वैश्विक परिदृश्य: AI और आतंकवाद
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9/11 के बाद: आतंकवाद समाप्त नहीं हुआ, बल्कि “लोन-वुल्फ” हमलों और कॉपीकैट हमलों ने वृद्धि की।
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IS-प्रेरित हमले: यूरोप और अमेरिका में वाहन से कुचलने जैसी घटनाएँ हाल के वर्षों में बढ़ीं (उदा. न्यू ऑरलियन्स, 2025)।
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AI से जुड़ी आशंकाएँ:
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आतंकवादी AI की मदद से जैविक हथियार (Bioweapons) तक पहुँच सकते हैं।
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AI मानव नियंत्रण से बाहर जाकर अस्तित्वगत संकट पैदा कर सकता है।
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👉 UPSC महत्व: सुरक्षा अब केवल पारंपरिक युद्ध तक सीमित नहीं है, बल्कि साइबर, बायोटेक और AI क्षेत्रों तक फैल चुकी है।
भारतीय परिदृश्य: घटता नक्सलवाद
जब पूरी दुनिया आतंकवाद के नए रूपों से जूझ रही है, भारत में नक्सलवादी हिंसा में लगातार गिरावट दर्ज हो रही है।
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गृह मंत्री का बयान (2024): 2026 के मध्य तक नक्सलवाद का अंत।
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इतिहास में पहली बार: पहले भी कई “झूठे सवेरे” (1970, 1990) देखने को मिले, लेकिन कभी भी इस स्तर का आधिकारिक दावा नहीं किया गया था।
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2024 से आगे अभियान:
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छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, ओडिशा, आंध्र प्रदेश में लगातार सुरक्षा अभियान।
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CPI (माओवादी) ने माना—2024 में 357 कैडर मारे गए, जिनमें एक-तिहाई महिला थीं।
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हिंसा का केंद्र: दंडकारण्य क्षेत्र (बस्तर, गढ़चिरौली और आस-पास के जंगल)।
गिरावट के कारण
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2018 के बाद नेतृत्व संकट (गणपति की विदाई)।
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सिकुड़ता प्रभाव और क्षेत्र।
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वैचारिक आकर्षण का क्षय—अब केवल अस्तित्व के लिए हिंसा।
‘स्प्रिंग थंडर’ से फीकी आँधी तक
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1960-70 का दौर: माओ, हो ची मिन्ह और चे ग्वेरा से प्रेरित।
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नारे: “चीन का चेयरमैन, हमारा चेयरमैन।”
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प्रारंभिक वादा: आदिवासियों और गरीबों को सशक्त बनाने का।
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वास्तविकता: क्षेत्रीय, विखंडित और हिंसात्मक रूप।
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आज के शहरी नक्सली: पहले जैसे वैचारिक नहीं, बल्कि ढीले-ढाले आलोचक/बौद्धिक समूह।
नीति और UPSC के लिए सबक
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वैश्विक बनाम भारतीय आतंकवाद: जहाँ विश्व AI-आधारित आतंकवाद की ओर देख रहा है, भारत घरेलू विचारधारा-आधारित हिंसा पर काबू पा रहा है।
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गलत वर्गीकरण का खतरा: “अर्बन नक्सल” जैसे लेबल नीति को भ्रमित कर सकते हैं।
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भारत की संतुलित नीति: अमेरिका की तरह “वॉर ऑन टेरर” नहीं, बल्कि स्थानीय जनता के समीप रहने के कारण संयमित बल का प्रयोग।
UPSC प्रासंगिकता
यह विषय GS पेपर-III (आंतरिक सुरक्षा) और निबंध दोनों के लिए महत्त्वपूर्ण है।
अभ्यर्थियों को सक्षम होना चाहिए:
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वैश्विक आतंकवाद और घरेलू उग्रवाद की तुलना करने में।
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तकनीकी खतरों (AI, बायोवेपन) का आकलन करने में।
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सरकारी नीति प्रतिक्रियाओं का मूल्यांकन करने में।
पूर्व वर्ष प्रश्न (UPSC)
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GS पेपर II/III
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“कृत्रिम बुद्धिमत्ता और साइबरस्पेस के दुरुपयोग से उत्पन्न आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों पर चर्चा कीजिए। भारत को इससे निपटने के लिए क्या तैयारी करनी चाहिए?” (संशोधित, UPSC 2021)
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“भारत में वामपंथी उग्रवाद घट रहा है। इसके कारणों का विश्लेषण कीजिए और उपलब्धियों को सुदृढ़ करने के उपाय सुझाइए।” (UPSC 2020)
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“पूर्वोत्तर सीमाओं पर केवल सीमा पार से घुसपैठ ही नहीं, अन्य कई सुरक्षा चुनौतियाँ मौजूद हैं। चर्चा कीजिए।” (UPSC 2020)
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“भारत में वामपंथी उग्रवाद के कारकों की व्याख्या कीजिए और सरकार की रणनीति बताइए।” (UPSC 2013)
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“आतंकवाद एक प्रतिस्पर्धी उद्योग बन चुका है। इससे निपटने के उपायों का विश्लेषण कीजिए।” (UPSC 2016)
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अभ्यास MCQs (प्रारंभिक परीक्षा हेतु)
Q1. निम्नलिखित क्षेत्रों पर विचार कीजिए:
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बस्तर
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गढ़चिरौली
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दंडकारण्य
इनमें से कौन-से क्षेत्र वामपंथी उग्रवाद (LWE) के केंद्र माने जाते हैं?
(a) 1 और 2 ही
(b) 2 और 3 ही
(c) 1, 2 और 3
(d) 1 ही
Q2. “लोन वुल्फ अटैक” का अर्थ क्या है?
(a) कई स्लीपर सेल द्वारा समन्वित हमला
(b) किसी व्यक्ति द्वारा अकेले, चरमपंथी विचारधारा से प्रेरित हमला
(c) केवल गैर-घातक हथियारों से किया गया हमला
(d) वित्तीय संस्थानों पर साइबर हमला
Q3. “स्प्रिंग थंडर” शब्द भारतीय इतिहास में किससे संबंधित है?
(a) 1960 का हरित क्रांति आंदोलन
(b) 1960 का नक्सलवादी आंदोलन
(c) 1970 के बिहार छात्र आंदोलन
(d) बॉम्बे कपड़ा मिल मज़दूर हड़ताल
निष्कर्ष
वैश्विक परिदृश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता-आधारित आतंकवाद की चेतावनी देता है, जबकि भारत 2026 तक नक्सलवाद के अंत की ओर बढ़ रहा है। UPSC अभ्यर्थियों के लिए यह विरोधाभास बेहद शिक्षाप्रद है—इतिहास से सीखते हुए और गलत वर्गीकरण से बचते हुए, ही नीतिनिर्माण और प्रशासन की दिशा सही तय की जा सकती है।
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