डिजिटल कल्याण राज्य और लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व का संकट
✍️ UPSC GS-2 और GS-4 के लिए विश्लेषणात्मक दृष्टिकोण
📘 UPSC से प्रासंगिकता
GS Paper 2 – शासन, कल्याण योजनाएं, संघीय संरचना, पारदर्शिता और उत्तरदायित्व
GS Paper 4 – नैतिकता और शासन में जवाबदेही, पारदर्शिता, और नैतिक चिंतन
🔍 प्रसंग: डिजिटल भारत में कल्याण का बदलता रूप
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आधार के एक अरब पंजीकरण
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DBT प्रणाली में 1206 योजनाएं
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36 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों में शिकायत निवारण पोर्टल
इन आंकड़ों से भारत का कल्याण संरचना अब तकनीकी दक्षता और डेटा संचालित निर्णयों पर आधारित होती जा रही है।
लेकिन इस डिजिटलीकरण में एक गंभीर प्रश्न उभरता है:
👉 क्या लोकतांत्रिक मानदंड और राजनीतिक जवाबदेही को तकनीकी दक्षता के नाम पर किनारे किया जा रहा है?
⚙️ तकनीकी शासन बनाम लोकतांत्रिक अधिकार
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भारत में अब यह सवाल नहीं पूछा जाता कि "कौन पात्र है और क्यों?"
बल्कि पूछा जाता है कि "लीकेज को कैसे कम किया जाए और कवरेज कैसे बढ़ाया जाए?" -
यह बदलाव दर्शाता है कि हमारी राजनीति ने कठिन निर्णय एल्गोरिद्म और डेटा के भरोसे छोड़ दिए हैं।
📚 विचारधारात्मक पृष्ठभूमि:
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हैबरमास की ‘टेक्नोक्रेटिक चेतना’
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फूको की ‘गवर्नमेंटैलिटी’
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रांसीयर का विचार: "किसकी पीड़ा दृष्टिगोचर और चुनौतीपूर्ण है, न कि केवल गणनीय"
🔄 कल्याण की दिशा बदल गई है
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आज, एक अधिकार-धारी नागरिक की जगह ऑडिट योग्य लाभार्थी ले चुका है।
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योजनाएं जैसे ई-श्रम और पीएम किसान एकतरफा, मापनीय, और त्रुटिहीनता पर केंद्रित हैं।
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ग्राम सभाएं, स्थानीय फीडबैक, और फ्रंटलाइन कर्मचारियों की विवेकशीलता जैसे लोकतांत्रिक पहलुओं को दरकिनार किया जा रहा है।
📉 सामाजिक क्षेत्र में गिरावट
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सामाजिक खर्च 2024-25 में घटकर 17% रह गया (2014-24 औसत: 21%)
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अल्पसंख्यक, श्रम, पोषण, और सामाजिक सुरक्षा से जुड़ी योजनाएं 11% से घटकर 3% हो गईं (COVID-19 के बाद)
🛑 सूचना का संकट: RTI का ह्रास
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RTI प्रणाली अस्तित्व संकट में है
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2024 तक 4 लाख से अधिक मामले लंबित
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8 मुख्य सूचना आयुक्त पद खाली (CIC रिपोर्ट 2023-24)
👉 यह दर्शाता है कि सूचना आयोग निष्क्रिय होते जा रहे हैं
🧾 शिकायत प्रणाली में एल्गोरिद्मिक इंसुलेशन
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CPGRAMS ने शिकायतों को ‘टिकट प्रणाली’ में बदल दिया
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हालांकि लाखों शिकायतें हल हुईं, लेकिन जवाबदेही सिर्फ 'दिखती' है, वास्तव में नहीं है
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यह केंद्रीकरण, उत्तरदायित्व को धुंधला करता है — एक एल्गोरिद्मिक आवरण तैयार करता है
💡 क्या हो समाधान? — लोकतांत्रिक एंटी-फ्रैजिलिटी की ओर
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तालेब की अवधारणा: अत्यधिक जुड़ी प्रणालियां तनाव में विफल हो सकती हैं
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इसलिए हमें चाहिए कि:
✅ संघीय सशक्तिकरण:
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राज्यों को स्थानीय आवश्यकता अनुसार योजनाएं डिजाइन करने की क्षमता मिले
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ग्राम पंचायत विकास योजना और राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान को केंद्र में लाया जाए
✅ समुदाय आधारित निगरानी:
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Kudumbashree (केरल) जैसे मॉडल अपनाए जाएं
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स्व-सहायता समूहों को सेवा वितरण में शामिल किया जाए
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ग्राम स्तर पर कानूनी सहायता और राजनीतिक शिक्षा को प्रोत्साहन मिले
✅ डिजिटल गवर्नेंस में सुधार:
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मानव फीडबैक, ऑफलाइन विकल्प, और "स्पष्टीकरण और अपील का अधिकार" सुनिश्चित किया जाए
(जैसा कि संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग ने सुझाया)
🧑🤝🧑 नागरिक केंद्रित कल्याण की वापसी
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जब कल्याण व्यवस्था से लोकतांत्रिक विमर्श हट जाता है, तो वह एक मशीन बन जाती है —
जो हर किसी के लिए कुशल है सिवाय उन लोगों के लिए, जिनके लिए वह बनी थी।
👉 "विकसित भारत" तभी संभव है, जब डिजिटलीकरण के साथ-साथ लोकतंत्र को भी सशक्त किया जाए।
✍️ UPSC उत्तर लेखन हेतु संभावित प्रश्न
Q: “तकनीकी दक्षता के नाम पर भारत में कल्याण व्यवस्था अब लोकतांत्रिक मूल्यों से दूर होती जा रही है।” चर्चा कीजिए।
उत्तर संकेत:
भूमिका:
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डिजिटल वेलफेयर राज्य की परिभाषा और उसके बढ़ते प्रयोग की पृष्ठभूमि
मुख्य भाग:
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आधार, DBT, शिकायत पोर्टल — लाभ और सीमाएं
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RTI प्रणाली का संकट, डेटा-संचालित एल्गोरिद्मिक नियंत्रण
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नागरिक की जगह लाभार्थी — अधिकारों का ह्रास
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राजनीतिक जवाबदेही का अवमूल्यन
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सामाजिक क्षेत्र खर्च में गिरावट और असमानता
निष्कर्ष:
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भविष्य का रास्ता डिजिटलीकरण के साथ लोकतांत्रिक पुनर्विचार में निहित है।
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