Wednesday, June 10, 2026

लोकसभा सीटों का विस्तार और परिसीमन: मुख्य संवैधानिक घटनाक्रम

 

लोकसभा सीटों का विस्तार और परिसीमन: मुख्य संवैधानिक घटनाक्रम

1. प्रस्तावित विधेयक की मुख्य बातें (Core Concepts)

विधेयक के पिछले संस्करण के विफल होने के बाद, सरकार कुछ महत्वपूर्ण संशोधनों के साथ इसे पुनः पेश करने की योजना बना रही है:

  • लोकसभा की सीटों में वृद्धि: लोकसभा की अधिकतम सीट संख्या को वर्तमान 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। यह कदम संसद भवन की नई क्षमता और जनसंख्या विस्तार को देखते हुए उठाया जा रहा है।

  • 1971 की जनगणना का आधार (महत्वपूर्ण बिंदु): दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को दूर करने के लिए, सरकार लोकसभा सीटों के अंतर-राज्यीय आवंटन (Inter-state allocation) के लिए 1971 की जनगणना को ही आधार बनाए रखने का प्रस्ताव कर रही है। इसका अर्थ यह है कि संसद का आकार (850 सीटें) तो बढ़ेगा, लेकिन प्रत्येक राज्य की सीटों का अनुपात उनकी वर्तमान स्थिति के अनुसार ही बढ़ेगा।

  • विधानसभाओं के लिए 2011 की जनगणना: राज्यों के भीतर विधानसभा सीटों के आंतरिक बँटवारे (Intra-state division) के लिए वर्तमान 2001 की जनगणना के स्थान पर 2011 की जनगणना को आधार बनाए जाने का प्रस्ताव है।

  • परिसीमन आयोग (Delimitation Commission): इस संवैधानिक संशोधन के पारित होने के बाद एक अलग 'परिसीमन विधेयक' लाया जाएगा, जिसके तहत नए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को तय करने के लिए परिसीमन आयोग का गठन किया जाएगा।

2. इस संशोधन की राजनीतिक और संवैधानिक पृष्ठभूमि

संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों का परिसीमन होना अनिवार्य है। परंतु, 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा लोकसभा और विधानसभा सीटों की संख्या को वर्ष 2026 तक के लिए फ्रीज (स्थिर) कर दिया गया था।

चूँकि यह समय-सीमा वर्ष 2026 में समाप्त हो रही है, इसलिए सरकार निम्नलिखित दो बड़े सुधारों को एक साथ लागू करने का प्रयास कर रही है:

  1. महिला आरक्षण का क्रियान्वयन: 2023 में पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को 33% आरक्षण देने के लिए सीटों का परिसीमन होना आवश्यक शर्त है।

  2. एक साथ चुनाव (Simultaneous Polls): सरकार का लक्ष्य वर्ष 2029 तक देश में 'एक राष्ट्र, एक चुनाव' की व्यवस्था को लागू करना है, जिसके लिए सीटों का पुनर्निर्धारण एक बुनियादी ज़रूरत है।

3. U.P.S.C. मुख्य परीक्षा हेतु विश्लेषणात्मक बिंदु (Mains Dimensions)

                            ┌───────────────────────────┐
                            │    परिसीमन की चुनौतियाँ      │
                            └─────────────┬─────────────┘
                                          │
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                 ▼                                                 ▼
┌─────────────────────────────────┐               ┌─────────────────────────────────┐
│     संघवाद और क्षेत्रीय असंतुलन       │               │ राजनीतिक प्रतिनिधित्व का संकट        │
├─────────────────────────────────┤               ├─────────────────────────────────┤
│ जिन दक्षिणी राज्यों ने जनसंख्या         │               │ यदि भविष्य में केवल जनसंख्या को      │
│ नियंत्रण नीतियों को सफलतापूर्वक        │               │ आधार बनाया गया, तो कम जनसंख्या   │
│ लागू किया, उन्हें सीटों के नुकसान       │              │ वाले राज्यों की केंद्रीय सत्ता           │
│ का डर है (उदा. DMK का विरोध)।     │               │ में आवाज़ कमजोर हो जाएगी।          │
└─────────────────────────────────┘               └─────────────────────────────────┘

सरकार द्वारा निकाला गया बीच का रास्ता (The Middle Path)

विधेयक में किया गया नया बदलाव (1971 की जनगणना को ही आधार बनाए रखना) इसी संघीय तनाव (Federal Friction) को कम करने का एक प्रयास है।

  • लाभ: इससे उत्तर प्रदेश या बिहार जैसे अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को उनकी आबादी के अनुपात में अचानक अत्यधिक सीटें नहीं मिलेंगी, जिससे दक्षिण भारतीय राज्यों (जैसे तमिलनाडु, केरल) का राजनीतिक भार संसद में कम नहीं होगा।

  • चुनौती: यह व्यवस्था 'एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य' (One Person, One Vote, One Value) के लोकतांत्रिक सिद्धांत के पूर्णतः अनुकूल नहीं है, क्योंकि बड़े राज्यों में एक सांसद अभी भी बहुत बड़ी आबादी का प्रतिनिधित्व करेगा।

Mains Takeaway: परिसीमन केवल भूगोल या जनसंख्या का पुनर्निर्धारण नहीं है, बल्कि यह भारतीय संघवाद की आत्मा और क्षेत्रीय संतुलन से जुड़ा विषय है। सरकार द्वारा 1971 की जनगणना को आधार बनाए रखना क्षेत्रीय चिंताओं को दूर करने और सहकारी संघवाद (Cooperative Federalism) को बढ़ावा देने की दिशा में एक व्यावहारिक कदम है।

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