महात्मा अय्यंकाली (Mahatma Ayyankali)
महात्मा अय्यंकाली (1863–1941) 19वीं और 20वीं सदी के त्रावणकोर (वर्तमान केरल) के प्रमुख समाज सुधारक थे। उन्हें केरल में दलितों और कृषि श्रमिकों के अधिकारों का अग्रदूत माना जाता है।
1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं जीवन परिचय
जन्म: 28 अगस्त 1863, वेंगानूर (तिरुवनंतपुरम के निकट), त्रावणकोर रियासत।
सामाजिक संदर्भ: 19वीं सदी के त्रावणकोर में जाति व्यवस्था अत्यंत कठोर थी। निचली जातियों (विशेषकर पुलया समुदाय) को सार्वजनिक सड़कों पर चलने, अच्छे वस्त्र पहनने और शिक्षा प्राप्त करने का अधिकार नहीं था।
उपाधि: महात्मा गांधी ने 1937 में उनसे मिलने के बाद उन्हें 'पुलाया राजा' (Pulaya King) और 'महात्मा' कहकर संबोधित किया था।
2. प्रमुख सामाजिक आंदोलन एवं योगदान
विल्लुवंडी समरम (Villuvandi Samaram - बैलगाड़ी आंदोलन, 1893)
उस समय निचली जातियों को सार्वजनिक मार्गों पर चलने और सजे हुए वाहनों के उपयोग पर प्रतिबंध था।
अय्यंकाली ने दो बैलों वाली सजी हुई गाड़ी (Villuvandi) खरीदी और उच्च जातियों के प्रभुत्व वाली सार्वजनिक सड़कों पर यात्रा की। इसे नागरिक स्वतंत्रता और सार्वजनिक स्थानों पर समान अधिकार की पहली बड़ी घोषणा माना जाता है।
शिक्षा का अधिकार एवं पहला ऐतिहासिक स्कूल (1904)
निचली जाति के बच्चों को सरकारी और निजी स्कूलों में प्रवेश नहीं दिया जाता था।
उन्होंने 1904 में वेंगानूर में वंचित वर्ग के बच्चों के लिए स्वयं का स्कूल स्थापित किया।
1914 में जब एक दलित बालिका (पंचमी) को स्कूल में प्रवेश दिलाने पर विरोध हुआ, तो उन्होंने प्रतिरोध का नेतृत्व किया।
भारत की पहली कृषि श्रमिक हड़ताल (1907–1908)
जब दलित बच्चों को स्कूलों में प्रवेश से रोका गया, तो अय्यंकाली ने कृषि मजदूरों को उच्च जातियों के खेतों में काम न करने का आह्वान किया।
यह भारत के इतिहास में दर्ज पहली संगठित कृषि श्रमिक हड़ताल मानी जाती है। इसके परिणामस्वरूप त्रावणकोर सरकार को दलित बच्चों के लिए सभी स्कूलों के दरवाजे खोलने का आदेश जारी करना पड़ा।
कल्लमला समरम (Kallumala Samaram - 1915)
उस समय दलित महिलाओं को गरिमापूर्ण वस्त्र पहनने की अनुमति नहीं थी और उन्हें पहचान के तौर पर पत्थरों/मनकों की भारी माला (Kallumala) पहननी पड़ती थी।
उन्होंने महिलाओं को इन दासता के प्रतीकों को त्यागने और गरिमापूर्ण पोशाक अपनाने के लिए प्रेरित किया।
3. संस्थागत एवं राजनीतिक योगदान
साधु जन परिपालन संगम (SJPS - 1907):
वंचित वर्गों के सामाजिक उत्थान, शिक्षा और कल्याण के लिए इस संगठन की स्थापना की।
इसका कार्य केवल आंदोलन तक सीमित नहीं था, बल्कि यह वित्तीय सहायता, मध्यस्थता और सामुदायिक विकास का केंद्र बना।
श्री मूलम प्रजा सभा (Sree Moolam Popular Assembly):
1912 में उन्हें त्रावणकोर की विधायिका (श्री मूलम प्रजा सभा) का सदस्य मनोनीत किया गया।
वह इस सभा में नामित होने वाले पहले दलित नेता थे, जहाँ उन्होंने वंचितों के भूमि अधिकार, शिक्षा और सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व की मांग उठाई।
4. समकालीन समाज सुधारकों के साथ तुलना
| पहलू | महात्मा अय्यंकाली | श्री नारायण गुरु |
| मुख्य कार्यक्षेत्र | त्रावणकोर (पुलया एवं कृषि श्रमिक) | त्रावणकोर/केरल (एझवा एवं व्यापक समाज) |
| दृष्टिकोण | प्रत्यक्ष नागरिक प्रतिरोध, श्रमिक लामबंदी, विधायी प्रयास | आध्यात्मिक सुधार, मंदिर प्रवेश, "एक जाति, एक धर्म, एक ईश्वर" |
| संस्था | साधु जन परिपालन संगम (SJPS, 1907) | श्री नारायण धर्म परिपालन योगम (SNDP, 1903) |
5. विगत वर्षों के अभ्यास प्रश्न (UPSC / State PCS)
प्रारंभिक परीक्षा (Prelims Practice)
प्रश्न: 19वीं सदी के समाज सुधारक महात्मा अय्यंकाली के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
उन्होंने वंचित वर्गों के अधिकारों के लिए 'साधु जन परिपालन संगम' की स्थापना की थी।
उन्होंने सार्वजनिक मार्गों पर आवागमन के अधिकार के लिए 'विल्लुवंडी आंदोलन' का नेतृत्व किया।
वे त्रावणकोर की 'श्री मूलम प्रजा सभा' के सदस्य के रूप में नामांकित होने वाले पहले दलित प्रतिनिधि थे।
उपर्युक्त कथनों में से कौन-से सही हैं?
(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3
उत्तर: (d) 1, 2 और 3 (सभी कथन सत्य हैं)।
मुख्य परीक्षा (Mains Practice Question)
प्रश्न (GS Paper I - आधुनिक भारतीय इतिहास): "महात्मा अय्यंकाली द्वारा 19वीं सदी के अंत और 20वीं सदी के प्रारंभ में चलाए गए सामाजिक आंदोलन केवल जाति सुधार तक सीमित नहीं थे, बल्कि वे आधुनिक नागरिक स्वतंत्रता और श्रम अधिकारों के अग्रदूत थे।" समीक्षा कीजिए। (15 अंक / 250 शब्द)
No comments:
Post a Comment