Tuesday, September 29, 2026

भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy)

भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) 

भूतापीय ऊर्जा (Geothermal Energy) पृथ्वी के आंतरिक भाग से प्राप्त होने वाली प्राकृतिक ऊष्मा (गर्मी) है।

'Geo' का अर्थ है पृथ्वी और 'Thermal' का अर्थ है ऊष्मा। यह ऊर्जा पृथ्वी की गहराई में मौजूद गर्म चट्टानों और तरल पदार्थों में संचित होती है।

यह ऊर्जा कैसे उत्पन्न होती है?

  1. पृथ्वी के निर्माण की अवशिष्ट ऊष्मा: जब अरबों साल पहले पृथ्वी का निर्माण हुआ था, तब की ऊष्मा का एक बड़ा हिस्सा आज भी इसके कोर (Core) और मैन्टल (Mantle) में मौजूद है।

  2. रेडियोधर्मी क्षय (Radioactive Decay): पृथ्वी के गर्भ में यूरेनियम, थोरियम और पोटैशियम जैसे रेडियोधर्मी तत्वों का लगातार क्षय होता रहता है, जिससे भारी मात्रा में ऊष्मा उत्पन्न होती है।

ऊर्जा प्राप्त करने की कार्यप्रणाली

  • पृथ्वी की गहराई में स्थित ऊष्मा भूमिगत जल को गर्म करके उच्च दबाव वाली भाप (Steam) में बदल देती है।

  • भूगर्भीय छिद्रों या कुओं (Geothermal wells) के माध्यम से इस भाप को सतह पर लाया जाता है।

  • यह उच्च दबाव वाली भाप टरबाइन को घुमाती है, जिससे जनरेटर के माध्यम से बिजली उत्पन्न होती है।

प्रमुख विशेषताएं

  • नवीकरणीय एवं निरंतर (Renewable & Constant): यह सौर या पवन ऊर्जा की तरह मौसम पर निर्भर नहीं करती; 24 घंटे लगातार उपलब्ध रहती है।

  • पर्यावरण-अनुकूल (Eco-Friendly): इसमें जीवाश्म ईंधनों की तुलना में अत्यंत कम ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।

  • स्थान-विशिष्ट (Location Specific): इसे केवल उन्हीं क्षेत्रों में आसानी से दोहन किया जा सकता है जहां टेक्टोनिक प्लेटों की सक्रियता या ज्वालामुखी क्षेत्र नजदीक हों (जैसे हॉट स्प्रिंग्स या गीजर वाले क्षेत्र)।

भारत में प्रमुख भूतापीय क्षेत्र

  • पुगा घाटी (Puga Valley), लद्दाख — भारत का सबसे प्रमुख और संभावनाशील क्षेत्र

  • मणिकरण (Manikaran), हिमाचल प्रदेश

  • तातापानी (Tattapani), छत्तीसगढ़

  • तपोवन (Tapovan), उत्तराखंड

  • सूरजकुंड (Surajkund), झारखंड

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